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________________ : ४७१ : नयवाद : विभिन्न दर्शनों के समन्वय की.... - नहीं है। यह वाक्य दो समास का है-तत्पुरुष और कर्मधारय "धम्मे पएसे-से पएसे धम्मे"। यदि तत्पुरुष के द्वारा कहता है तो ऐसा नहीं कहना चाहिए अथवा कर्मधारय से कहता है तो विशेष रूप से कथन करना चाहिए। जैसे कि-धर्म और उसका जो प्रदेश है वही प्रदेश धर्मास्तिकाय है, इसी प्रकार अधर्म और उसका जो प्रदेश है, वही प्रदेश अधर्मात्मक है। समभिरूढनय के वचन को सुनकर सम्प्रति एवंभूतनय ने कहा कि तुम्हारा यह कथन युक्तिसंगत नहीं है । धर्मास्तिकाय आदि पदार्थों का स्वरूप देश, प्रदेश की कल्पना से रहित तथा प्रतिपूर्ण-आत्मस्वरूप से अविकल और अवयव रहित एक नाम से ग्रहण किया गया है। कहा हैदेसेऽवि से अवत्थू पएसेऽवि से अवत्थू । --अणुओगद्दाराइं, सूत्र ४७६ अर्थात् एवंभूतनय की अपेक्षा देश भी अवस्तु है, प्रदेश भी अवस्तु है। भेद नहीं है। एक अखण्ड वस्तु ही ग्राह्य हो सकती है । अपेक्षाभेद से नेगमादि नयों का आगमों में विवेचन है। ये सातों नय अपना-अपना मत निरपेक्षता से वर्णन करते हुए दुर्नय हो जाते हैं । 'सौगतादि समयवत' और परस्पर सापेक्ष होते हुए सन्नय हो जाते हैं । इन सात नयों का जो परस्पर सापेक्ष कथन है वही सम्पूर्ण जैनमत है। क्योंकि जैनमत अनेक नयात्मक है, एक नयात्मक नहीं। स्याद्वादमंजरी' में कहा है कि हे नाथ ! जैसे सब नदियां समुद्र में इकट्ठी हो जाती हैं उसी प्रकार आपके मत में सब नय एक साथ हो जाते हैं। किन्तु आपका मत किसी भी नय में समावेश नहीं हो सकता। जैसे कि समुद्र में नदी में नहीं समाविष्ट होता इसी प्रकार सभी वादियों का सिद्धान्त तो जैनमत है लेकिन सम्पूर्ण जनमत किसी वादी के मत में नहीं है। नयवाद की सैद्धान्तिकता और व्यावहारिकता तत्त्वतः सभी पदार्थ सामान्य-विशेषरूप हैं। परन्तु अल्पज्ञानी धर्म, अधर्म, आकाश-काल, इन अपोद्गलिक पदार्थों के सामान्य-विशेषत्व को सम्यग् प्रकार से नहीं समझ सकते, शब्दादि पौद्गलिक पदार्थों के सामान्य-विशेषत्व को अच्छी प्रकार समझ सकते हैं । केवल नंगमनय का अनुकरण करने वाले न्याय-वैशेषिक परस्पर भिन्न और निरपेक्ष सामान्य और विशेष दोनों को स्वीकार करते है । नैगमनय के अनुसार अभिन्न ज्ञान का कारण सामान्यधर्म विशेषधर्म से भिन्न है। दो धर्म अथवा दो धर्मी अथवा एक धर्म और एक धर्मी में प्रधान और गौणता की विविक्षाओं को 'नकगम' अथवा नैगमनय कहते हैं। परन्तु दो धर्म, दो धर्मी अथवा एक धर्म और एक धर्मी में सर्वथा भिन्नता दिखाने को 'नगमाभास' कहते हैं। निगम शब्द का अर्थ है-देश-संकल्प और उपचार। इनमें होने वाले अभिप्राय को नैगमनय कहते हैं। अर्थात् इसमें तादात्म्य की अपेक्षा से ही सामान्य विशेष की भिन्नता का समर्थन किया जाता है। वेदांती और सांख्य केवल संग्रहनय को मानते हैं। विशेषरहित सामान्यमात्र जानने वाले को संग्रहनय कहते हैं। संग्रहनय एक शब्द के द्वारा अनेक पदार्थों को ग्रहण करता है अथवा एक अंश या अवयव का नाम लेने से सर्वगुणपर्याय सहित वस्तु को ग्रहण करने वाला संग्रहनय है। यद्यपि संग्रहनय की अपेक्षा द्रव्य और पर्याय सत् से अभिन्न हैं--परन्तु व्यवहारनय की १ उदधाविव सर्वसिन्धवः, समुदीर्णास्त्वयिनाथ दृष्टयः । न च तासु भवान् प्रदृश्यते, प्रविभक्तासु सरित्स्विवोदधिः ।। २ निगम: देशसंकल्पः उपचारो वा तत्र भवो नैगमः । -स्याद्वादमंजरी -जैन सिद्धांत दीपिका १६ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.012021
Book TitleJain Divakar Smruti Granth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKevalmuni
PublisherJain Divakar Divya Jyoti Karyalay Byavar
Publication Year1979
Total Pages680
LanguageHindi
ClassificationSmruti_Granth & Articles
File Size17 MB
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