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________________ ५०० : सिद्धान्ताचार्य पं० फूलचन्द्र शास्त्री अभिनन्दन-ग्रन्थ वे पाँच तत्त्व ये हैं-पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल । इनमें जीव तत्त्वके मिला देने पर कुल छह तत्त्व होते हैं । जैन दर्शन इन्हें द्रव्य शब्दसे पुकारता है । जीव द्रव्यका स्वरूप पहले बतलाया ही है । शेष द्रव्योंका स्वरूप निम्न प्रकार है जिसमें स्पर्श, रस, गन्ध और रूप पाया जाता है उसे पुदगल' कहते हैं। जैन दर्शनमें स्पर्शादिककी मूर्त संज्ञा है, इसलिये वह मूर्त माना गया है। किन्तु शेष द्रव्योंमें ये स्पर्शादिक नहीं पाये जाते, इसलिये वे अमूर्त हैं । जो गमन करते हुए जीव और पुदगलोंके गमन करनेमें सहायता प्रदान करता है उसे धर्म द्रव्य कहते हैं । अधर्म द्रव्यका स्वरूप इससे उलटा है । यह ठहरे हए जीव और पुद्गलोंके ठहरनेमें सहायता प्रदान करता है । इन दोनों द्रव्योंके स्वरूपका स्पष्टीकरण करनेके लिये जल और छायाका दृष्टान्त दिया जाता है। जैसे मछलीके गमन करने में जल और पथिकके ठहरनेमें छाया सहायता प्रदान करते हैं ठीक यही स्वभाव क्रमसे धर्म और अधर्म द्रव्यका है। जो वस्तुकी पुरानी अवस्थाके व्यय और नूतन अवस्थाके उत्पादमें सहायता प्रदान करता है उसे काल द्रव्य' कहते हैं। और प्रत्येक पदार्थके ठहरनेके लिये जो अवकाश प्रदान करता है उसे आकाश द्रव्य कहते हैं। इनमेंसे धर्म, अधर्म, आकाश और काल ये चार द्रव्य सदा अविकारी माने गये हैं। निमित्तवश इनके स्वभावमें कभी भी विपरिणाम नहीं होता। किन्तु जीव और पदगल ये ऐसे द्रव्य है जो अविकारी और विकारी दोनों प्रकारके होते हैं। जब ये अन्य द्रव्यसे संश्लिष्ट रहते हैं तब विकारी होते हैं और इसके अभावमें अविकारी होते हैं । इस हिसाबसे जीव और पुद्गलके दो-दो भेद हो जाते हैं। संसारी और मुक्त ये जीवके दो भेद हैं । तथा अणु और स्कन्ध ये पुद्गलके दो भेद हैं । जीव मुक्त अवस्थामें अविकारी है और संसारी अवस्थामें विकारी। पुद्गल अणु अवस्थामें अविकारी है और स्कन्ध अवस्थामें विकारी । तात्पर्य यह है कि जीव और पुद्गल जब तक अन्य द्रव्यसे संश्लिष्ट रहते हैं तब तक उस संश्लेषके कारण उनके स्वभावमें विपरिणति हुआ करती है, इसलिये वे उस समय विकारी रहते हैं और संश्लेषके हटते ही वे अविकारी हो जाते हैं। बन्धकी योग्यता-इन दोनोंका अन्य द्रव्यसे संश्लिष्ट होना इनकी योग्यता पर निर्भर है। यह योग्यता जीव और पुद्गलमें ही पाई जाती है, अन्य में नहीं। ऐसी योग्यताका निर्देश करते हुए जीवमें उसे मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय और योगरूप तथा पुद्गलमें उसे स्निग्ध और रूक्ष गुणरूप बतलाया है। जीव मिथ्यात्व आदिके निमित्तसे अन्य द्रव्यसे बन्धको प्राप्त होता है। और पुदगल स्निग्ध और रूक्ष गुणके निमित्तसे अन्य द्रव्यसे बन्धको प्राप्त होता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। जीवमें मिथ्यात्वादिरूप योग्यता संश्लेषपूर्वक ही होती है, इसलिये उसे अनादि माना है। किन्तु पुद्गलमें स्निग्ध या रूक्षगुणरूप योग्यता संश्लेषके बिना भी पाई जाती है, इसलिये वह अनादि और सादि दोनों प्रकार की मानी गई है। इससे जीव और पुद्गल केवल इन दोनोंका बन्ध सिद्ध होता है। क्योंकि संश्लेष बन्धका पर्यायवाची है। किन्तु प्रकृतमे जीवका बन्ध विवक्षित है, इसलिये आगे उसी चर्चा करते हैं१. 'स्पर्शरसगन्धवर्णवन्तः पुद्गलाः।-त० सू० ५-२३ ।। २. द्रव्य० गा० १८ । ३. द्रव्य० गा० १९। ४. द्रव्य गा० २० । ५. द्रव्य गा० २२ । ६. त० सू० ८-१। ७. स्निग्धरूक्षत्वाद्बन्धः ।-त० सू० ५-३३ । जोत Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.012004
Book TitleFulchandra Shastri Abhinandan Granth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJyoti Prasad Jain, Kailashchandra Shastri
PublisherSiddhantacharya Pt Fulchandra Shastri Abhinandan Granth Prakashan Samiti Varanasi
Publication Year1985
Total Pages720
LanguageHindi
ClassificationSmruti_Granth & Articles
File Size18 MB
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