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________________ आचारचिन्तामणि-टीका अध्य.१ उ.३ सू.२ श्रद्धास्वरूपम् છે, जघन्यतोऽन्तर्मुहूर्तम्, स उत्कर्पतो देशोनापुद्गलपरावर्त्त स्थित्वा पुनः सम्यक्त्वं प्राप्स्यति, स सादिमिथ्यादृष्टिर्भवति ।। ___ यथाप्रवृत्तिकरणम्एवमुभयविधस्य मिथ्यादृष्टेजीवस्य परिणामरूपाध्यवसायः पूर्वं जघन्यशुभपरिणाममङ्गीकृत्य परः परः शुभपरिणामः परिणामविशेष इत्युच्यते । स एव परिणामविशेषो 'यथाप्रवृत्तिकरण'-मित्युच्यते । ___ यथाप्रवृत्तिकरण-मित्यस्य शब्दार्थस्त्वेवम्-यथा येन अनादिसंसिद्धप्रकारेण प्रवृत्तिर्यस्य तत् यथाप्रवृत्ति, क्रियते कर्मक्षपणमनेनेति करण जीवस्य शुभपरिणामः, यथाप्रवृत्ति च तत्करणं च यथाप्रवृत्तिकरणं कर्मक्षपणकारणस्याबाद में अनन्तानुबन्धी कषाय के उदय से फिर मिथ्यात्व आ गया किन्तु वह मिथ्यात्व जघन्य अन्तर्मुहूर्त तक और उत्कृष्ट देशोन अर्द्धपुद्गलपरावर्तन तक रहता है वह जीव सादिमिथ्यादृष्टि है। यथाप्रवृत्तिकरणइस प्रकार दोनों प्रकार के मिथ्यादृष्टि जीवों का अध्यवसाय पहले के जघन्य शुभ परिणाम से लेकर उत्तरोत्तर बढते हुए शुभ परिणाम, परिणामविशेष कहलाता है। उसी परिणामविशेष को 'यथाप्रवृत्तिकरण' कहते है। 'यथाप्रवृत्तिकरण' का शब्दार्थ इस प्रकार है-'यथा' अर्थात् अनादिकालीनरूप से जिस की प्रवृत्ति हो वह यथाप्रवृत्ति कहलाता है । जिस से कर्मों का क्षय किया जाता है, जीव के उस शुभ परिणाम को 'करण' कहते है । यथाप्रवृत्तिઅનન્તાનુબંધી કષાયના ઉદયથી ફરીથી મિથ્યાત્વ આવી ગયું. પણ તે મિથ્યાત્વ જઘન્ય અન્તમુહૂર્ત સુધી અને ઉત્કૃષ્ટ દેશેન અદ્ધ પુદ્ગલપરાવર્તન સુધી રહે છે. તે જીવ સાદિમિથ્યાષ્ટિ છે. यथावृत्ति:२४આ પ્રકારના બને મિદષ્ટિ ના અધ્યવસાય પહેલાના જઘન્ય શુભ પરિણામથી લઈને ઉત્તરોત્તર વધતા શુભ પરિણામ, પરિણામવિશેષ કહેવાય છે. તે પરિણામ विशेषने यथाप्रवृत्तिकरण छ. "यथाप्रवृतिकरण" न शहाथ 20 मारे छ-'यथा' मर्यात मनाहिदीनपथी २नी 'प्रवृत्ति' डाय ते 'यथाप्रवृत्ति' ४वाय छे. नाथी ४ाना क्षय ४२पामा मा छ, न त शुभ परिणामने "करण" हे.
SR No.011616
Book TitleAgam 01 Ang 01 Acharanga Sutra Part 01 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherJain Shastroddhar Samiti Ahmedabad
Publication Year1958
Total Pages801
LanguagePrakrit, Sanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Gujarati, Agam, Canon, & agam_acharang
File Size35 MB
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