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________________ १८६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् __ अर्थ हे आत्मन्! जबतक तेरे चित्तमें आशारूपी अग्नि खतंत्रतासे नितान्त प्रज्वलित होरहा है तबतक तेरे महादुःखरूपी दाहकी शान्ति कहांसे हो ॥ १२ ॥ निराशतासुधापूरैर्यस्य चेतः पवित्रितम् । तमालिङ्गति सोत्कण्ठं शमश्रीबद्धसौहृदा ॥ १३ ॥ अर्थ-जिसका चित्त निराशतारूपी अमृतके प्रवाहोंसे पवित्र हो चुका है, उस पुरुषको प्रीतिसे बँधी हुई उपशमभावरूपी लक्ष्मी उत्कंठापूर्वक आलिंगन करती है। भावार्थ-आशासे मैले हुए चित्तमें उपशमभाव नहिं आ सकते ॥ १३ ॥ न मज्जति मनो येषामाशाम्भसि दुरुत्तरे। तेषामेव जगत्यस्मिन्फलितो ज्ञानपादपः ॥ १४ ॥ अर्थ-इस जगतमें जिनका मन दुस्तर आशारूपी जलमें नहिं डूबता उनके ही ज्ञानरूपी वृक्ष फलता है। भावार्थ-आशारूपी दुस्तर जलमें ज्ञानरूपी वृक्ष गल जाता है, इसकारण फल नहिं लगता ॥ १४ ॥ शक्रोऽपि न सुखी खर्गे स्यादाशानलदीपितः। विध्याप्याशानलज्वालां श्रयन्ति यमिनः शिवम् ॥ १५॥ अर्थ-वर्गका इन्द्र भी आशारूपी अग्निसे जलता हुआ सुखी नहीं है और मुनिगण तो आशारूपी अमिकी ज्वालाको वुझाकर मोक्षका आश्रय करलेते हैं । अर्थात् मुनिगण निराशताका अवलंबन करके सर्वथा सुखी हो जाते हैं ॥ १५ ॥ चरस्थिरार्थजातेषु यस्याशा प्रलयं गता। किं किं न तस्य लोकेऽस्मिन्मन्ये सिद्धं समीहितम् ॥ १६ ॥ अर्थ-आचार्य महाराज कहते हैं कि जिस पुरुपकी चराचर (चित् अचित्) पदाोंमें आशा नष्ट हो गई है, उसके इसलोकमें क्या क्या मनोवांछित सिद्ध नहिं हुए ? अर्थात् सर्व मनोवांछित सिद्ध हुए ऐसा मैं मानता हूं ॥ १६ ॥ चापलं त्यजति स्वान्तं विक्रियाश्चाक्षदन्तिनः। प्रशाम्यति कषायाग्निनैराश्याधिष्ठितात्मनाम् ॥ १७॥ : अर्थ-जिनकी आत्माने निराशताको खीकृत किया है, उनका मन तो चपलताको छोड़ देता है और इन्द्रियरूपी हस्ती विषयविकारताको छोड़ देते हैं तथा कषायरूपी अग्नि शान्त हो जाती है ॥ १७ ॥ किमत्र बहुनोक्तेन यस्याशा निधनं गता। स एव महतां सेव्यो लोकद्वयविशुद्धये ॥१८॥ . अर्थ-आचार्य महाराज कहते हैं कि बहुत कहांतक कहैं? इतना ही बहुत है कि
SR No.010853
Book TitleGyanarnava
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Baklival
PublisherParamshrut Prabhavak Mandal
Publication Year1913
Total Pages471
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size23 MB
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