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Jain Terms Preserved: MAAnand The characteristics of prakruta (natural) and vikruta (abnormal) sutaka (impurity due to menstruation or childbirth). That which is born naturally in women every month is called prakruta raja (natural menstruation). And that which occurs untimely due to the excess of dravya (substance), roga (disease) and udrekaata (excitement) is called vikruta raja (abnormal menstruation). Bhavaartha (meaning) - Some women become menstrual even a month earlier, in which there are three causes: dravya, raaga (passion) and roga. The menstruation arising from these three causes is called vikruta raja, not raja (menstruation). These three cause-born vikruta raja have three types - rogaja (disease-born), raagaja (passion-born) and dravyaja (substance-born). The menstruation that starts before the conception of offspring due to the increase of mada (intoxication) is rogaja raja. The repeated bleeding due to the imbalance of pitta (bile) etc. doshas is raagaja raja. And that which arises due to the imbalance of dhatus (bodily elements) is dravyaja raja. And the menstruation that occurs after the month is kaalaja (time-born) and prakruta. If the menstruation of women occurs untimely, it does not defile them. The period above fifty years is also called akaal (untimely). The impurity (ashaucha) of women lasts for three days from the sight of raja (menstruation). If the kaalaja (time-born) [menstruation] arises before half the night, it is the view of some. If the raja (menstruation) arises in the night itself and dies, the previous day should be considered. One should make three parts of the night, the first two parts belong to the previous day, and the last part belongs to the next day. If the woman becomes menstrual after the ritu-kaala (menstrual cycle), she becomes pure by just bathing before eighteen days. She does not need to observe the three-day impurity again.
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________________ MAAnand त्रैवर्णिकाचार [... प्रकृत और विकृत सूतकके लक्षण । मकृतं जायते स्त्रीणां मासे मासे स्वभावतः । अकाले द्रव्यरोगापुद्रेकात्तु विकृतं मतम् ॥ ६ ॥ स्त्रियों के जो स्वभावसे ही महीने-महीनेमें रजस्राव होता है उसे प्राकृत रज कहते हैं । और जो असमयमें द्रव्य, रोग और आदि शब्दसे राग-इन तीनोंके उद्रेकसे जो रक्तस्राव होता है उसे विकृत रज कहते हैं। भावार्थ-कितनीही स्त्रियां एक माह पहले भी रजस्वला हो जाती है, उसमें द्रव्य, राग और रोग ऐसे तीन कारण हैं । इन तीनों कारणोंसे रजस्राव होनेको विकृत रजस्राव कहते हैं। इन तीन कारणजन्य रजकी संज्ञा रक्त है, रजनहीं । इन तीम कारणजन्य विकृत रजके तीन भेद हो जाते है-रोगज, रागज और द्रव्यज | संतति उत्पन्न होनेके पहले मजाके बढ़ जा. नेसे जो स्त्रियोंके रक्त बहने लगता है वह रोगज रज है । पित्त आदि दोपोंकी विषमतासे जो पुनः पुनः रक्त बहता है वह रागज रज है । और जो धातुओंकी विषमतासे उत्पन्न होता है. वह द्रव्यज रज है । तथा महीने बाद जो रजसाव होता है वह कालज है और प्राकृत है ॥ ६ ॥ अकाले यदि चेत् स्त्रीणां तद्रजो नैव दुष्यति । पञ्चाशद्वपावं तु अकाल इति भाषितः ॥७॥ स्त्रियोंके जो अकालमें रजस्राव होता है उससे वे दूषित (अशुद्ध ) नहीं हैं या वह रज पित रज नहीं है । पचास वर्षसे ऊपरका काल भी अकाल कहा गया है ।।.७ ॥ रजसो दर्शनात्स्त्रीणामशौचं दिवसत्रयम् । कालजे चार्द्धरात्राचेत्पूर्वं तत्कस्यचिन्मतम् ॥ ८ ॥ रात्रावेव समुत्पन्ने मृते रजसि मूतके । पूर्वमेव दिनं ग्राह्यं यावनोदेति वै रविः ॥९॥ रात्रेः कुर्यात्रिभागं तु द्वौ भागा पूर्ववासरे । तो मूते मृते चैव शेयोऽन्त्यांशः परेऽहनि ॥ १० ॥ रजोदर्थन के समयसे लेकर तीन दिन तक स्त्रियां अशुद्ध रहती है-वे चौथे दिन गृहकार्योंके योग्य होती है। आधी रातसे पहले यदि स्त्री रजस्वला हो, या कोई मर जाय, या प्रसूति हो तो उस रातको पहले दिनमें ही गिनना चाहिए | अथवा तीनों कार्य रानिमें किसी भी समय हो, जब तक सर्यन उगे तबतक उस सारी रातको पहले दिनमें ही शुमार करना चाहिए। अथवा रात्रिके तीन भाग करे । उनमेस पहलेके दो भागोंमें ये तीनों कार्य हों तो उन दोनों भागोको पहले दिनमें और भन्तके तीसरे भागको आगेके दिनमें गिनना चाहिए । इस तरह इस विषयमें तीन मत हैं ॥१०॥ ऋतुकाले व्यतीते तु यदि नारी रजस्वला । : तत्र लानेन शुद्धिः स्यादष्टादशदिनात्पुरा ॥ ११ ॥. ऋतुकालके बीत जानेपर अठारह दिनसे पहले यदि कोई स्त्री रजस्वला हो जाय तो वह सिर्फ स्लाम कर लेनेपर शुद्ध है; उसे पुनः तीन दिन तक आशौच पालनेकी आवश्यकता नहीं ॥ ११ ॥
SR No.010851
Book TitleTraivarnikachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Soni
PublisherJain Sahitya Prakashak Samiti
Publication Year
Total Pages438
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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