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________________ ३३ वो वर्ष ६६३ कुदकुदाचार्यकृत 'समयसार' ग्रन्थ भिन्न है । यह ग्रन्थकर्ता अलग है, और ग्रन्थका विषय भी अलग है । ग्रन्थ उत्तम है। ___आर्य त्रिभोवनके देहोत्सर्ग करनेकी खबर आपको मिली जिससे खेद हुआ, यह यथार्थ है। ऐसे कालमे आर्य त्रिभोवन जैसे मुमुक्षु विरल है। दिन प्रति दिन शातावस्थासे उसका आत्मा स्वरूपलक्षित होता जाता था। कर्मतत्त्वका सूक्ष्मतासे विचार कर, निदिध्यासन कर आत्माको तदनुयायी परिणतिका निरोध हो यह उसका मुख्य लक्ष्य था । विशेष आयु होती तो वह मुमुक्षु चारित्रमोहको क्षीण करनेके लिये अवश्य प्रवृत्ति करता। '। , शाति शातिः शाति. ___९३१ , ववाणिया, जेठ वदी.९, गुरु, १९५६ शुभोपमालायक मेहता चत्रभुज बेचर, मोरबी। आज आपका एक पत्र डाकमे मिला | पूज्यश्रीको यहाँ आनेके लिये कहे। उन्हे अपना वजन बढ़ाना अपने हाथमे है। अन्न, वस्त्र या मनकी कुछ तगी नही है। केवल उनके समझनेमे अतर हुआ है इसलिये यूँ ही रोष करते है, इससे उलटा उनका वजन घटता है परतु बढता नही है। उनका वजन बढे और वे अपने आत्माको शात रखकर कुछ भी उपाधिमे न पडते हुए इस देह-प्राप्तिको सार्थक करें इतनी ही हमारी विनती है। उन्हें दोनो व्यसन वशमे रखने चाहिये । व्यसन बढानेसे बढते हैं और नियममे रखनेसे नियममे रहते हैं। उन्होने थोड़े समयमे व्यसनको तीन गुना कर डाला है, तो उसके लिये उन्हे उलाहना देनेका हेतु इतना ही है कि इससे उनकी कायाको बहुत नुकसान होता है, तथा मन परवश होता जाता है, जिससे इस लोक और परलोकका कल्याण चूक जाता है। उमरके अनुसार मनुष्यकी प्रकृति न हो तो मनुष्यका वजन नही पडता और वजन रहित मनुष्य इस जगतमे निकम्मा है। इसलिये उनका वजन रहें इस तरह वर्तन करनेके लिये हमारा अनुरोध है । सहज बातमे बीचमे आनेसे वजन नही रहता पर घटता है । यह ध्यान रखना चाहिये । अव तो थोड़ा समय रहा है तो जैसे वजन बढे वैसे वर्तन करना चाहिये। हमे सप्राप्त हुई मनुष्यदेह भगवानको भक्ति और अच्छे काममे गुजारनी चाहिये। पूज्यश्रीको आज रातकी ट्रेनमे भेजें। ९३२ ववाणिया, ज्येष्ठ वदी १०, १९५६ पत्र प्राप्त हुए । शरीर-प्रकृति स्वस्थास्वस्थ रहती है, विक्षेप कर्तव्य नही है। हे आर्य ! अतर्मुख होनेका अभ्यास करें। • शाति ९३३ ॐ नमः । अपूर्व शाति और समाधि अचलतासे रहती है । कुभक, रेचक, पांचो वायु सर्वोत्तम गतिको आरोग्य. वलसहित देती हैं ! ..
SR No.010840
Book TitleShrimad Rajchandra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHansraj Jain
PublisherShrimad Rajchandra Ashram
Publication Year1991
Total Pages1068
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Rajchandra
File Size49 MB
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