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________________ ४६४ श्रीमद् राजचन्द्र ५८२ बबई, चैत्र वदी ८, १९ आत्मवीर्य के प्रवर्तन और संकोच करनेमे बहुत विचारपूर्वक प्रवृत्ति करना योग्य है। शुभेच्छासम्पन्न भाई कुंवरजी आणदजीके प्रति, श्री भावनगर । विशेष विनती है कि आपका लिखा हुआ एक पत्र प्राप्त हुआ है। उस तरफ आनेके सम्बन्धमे निम् लिखित स्थिति है। लोगोको सन्देह हो इस प्रकारके बाह्य व्यवहारका उदय है । और वैसे व्यवहारके सा बलवान निग्रंथ पुरुष जैसा उपदेश करना, वह मार्गका विरोध करने जैसा है, और ऐसा जानकर तथा उ जैसे दूसरे कारणोका स्वरूप विचारकर प्रायः जिससे लोगोको सन्देहका हेतु हो वैसे प्रसगमे मेरा आना ना होता। कदाचित् कभी कोई समागममे आता है, और कुछ स्वाभाविक कहना-करना होता है, इसमे * चित्तकी इच्छित प्रवृत्ति नही है । पूर्वकालमे यथास्थित विचार किये बिना जोवने प्रवृत्ति की, उससे ऐं व्यवहारका उदय प्राप्त हुआ है, जिससे कई बार चित्तमे शोक रहता है। परंतु यथास्थित समपरिणाम वेदन करना योग्य है, ऐसा समझकर प्रायः वैसी प्रवृत्ति रहती है। फिर आत्मदशाके विशेष स्थिर होने लिये असगतामे ध्यान रहा करता है । इस व्यापारादिके उदय-व्यवहारसे जो जो सग होते है, उनमे प्राय असग परिणामवत् प्रवृत्ति होती है, क्योकि उनमे सारभूत कुछ नही लगता। परंतु जिस धर्मव्यवहारखे प्रसगमे आना होता है, वहाँ उस प्रवृत्तिके अनुसार व्यवहार करना योग्य नही है। तथा दूसरे आशयक विचारकर प्रवृत्ति की जाये तो उतनी सामर्थ्य अभी नही है, इसलिये वैसे प्रसंगमे प्रायः मेरा आना कम होता है, और इस क्रमको वदलना अभी चित्तको जचता नही है। फिर भी उस तरफ आनेके प्रसगमे वैसा करनेका कुछ भी विचार मैंने किया था, तथापि उस क्रमको बदलते हुए दूसरे विषम कारणोका आगे जाकर सभव होगा ऐसा प्रत्यक्ष दीखनेसे क्रम बदलने सबधी वृत्तिका उपशम करना योग्य लगनेसे वेसा किया है। इस आशयके सिवाय चित्तमे दूसरा आशय भी उस तरफ अभी नही आनेके सबधमे है, परतु किसी लोकव्यवहाररूप कारणसे आनेके विचारका विसर्जन नही किया है। चित्तपर अधिक दबाव डालकर यह स्थिति लिखी है, उसपर विचारकर यदि कुछ आवश्यक जैसा लगे तो प्रसगोपात्त रतनजीभाईसे स्पष्टता करें। मेरे आने न आनेके विषयमे यदि कुछ बात न कह सकें तो वैसा करनेकी विनती है। वि० रायचदके प्रणाम। बबई, चैत्र वदी ११, शुक्र, १९५१ ___एक आत्मपरिणतिके सिवाय दूसरे जो विषय हैं उनमे चित्त अव्यवस्थिततासे रहता है, और वैसी अव्यवस्थितता लोकव्यवहारसे प्रतिकूल होनेसे लोकव्यवहार करना रुचता नही है, और छोडना नही बन पाता, यह वेदना प्राय दिनभर वेदनमे आती रहती है। खानेमे, पीनेमे, बोलनेमे, शयनमे, लिखनेमे या अन्य व्यावहारिक कार्योमे यथोचित भानसे प्रवृत्ति नही की जाती और वैसे प्रसग रहा करनेसे आत्मपरिणतिका स्वतंत्र प्रगटरूपसे अनुसरण करनेमे विपत्ति आया करती है, और इस विषयका प्रतिक्षण दु.ख रहा करता है। ___अचलित आत्मरूपसे रहनेकी स्थितिमे हो चित्तेच्छा रहती है, और उपर्युक्त प्रसगोकी आपत्तिके कारण कितना ही उस स्थितिका वियोग रहा करता है, और वह वियोग मात्र परेच्छासे रहा है, स्वेच्छाके कारणसे नही रहा, यह एक गम्भीर वेदना प्रतिक्षण हुआ करती है। ___ इसी भवमे और थोड़े ही समय पहले व्यवहारके विषयमे भी स्मृति तीव्र थी। वह स्मृति अव व्यवहारके विषयमे क्वचित् ही रहती है और वह भी मंदरूपसे । थोड़े ही समय पहले अर्थात् थोड़े वर्षों पहले वाणी बहुत बोल सकती थी, वकारूपसे कुशलतासे प्रवृत्ति कर सकती थी, वह अब मदरूपसे
SR No.010840
Book TitleShrimad Rajchandra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHansraj Jain
PublisherShrimad Rajchandra Ashram
Publication Year1991
Total Pages1068
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Rajchandra
File Size49 MB
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