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________________ प्रकाशकीय पू. सत्यभक्त जी की यह आत्मकथा है । सत्यभक्तजी के पास . समय समय पर अनेक सज्जनों के पत्र आया करते थे कि आप अपना जीवन परिचय हमको लिख भेजिये, इसलिये अनेकबार चिट्ठिओं में टूटा-फूटा परिचय भेजा भी जाता था, पर उससे तो लोगों की प्यास ही बढ़ती थी, इसलिये आत्मकथा लिखने की जरूरत · हुई. और इसीलिये यह आत्मकथा लिखी गई । • यद्यपि इस आत्मकथा में अपने जीवन की सारी घटनाओं को साधारण रूप में देने की कोशिश की गई है, फिर भी इसमें इतना मनोवैज्ञानिक चित्रण आ गया है कि पढ़नेवालों को इसमें कथा और दर्शन का आनंद एक साथ ही आता है । जीवन निर्माण की दृष्टि से भी यह ऐसी चीज वन गई हैं कि लेनेवाला इससे बहुत ले सकता है । कुछ '.'.. • करीब आधी आत्मकथा सत्यसन्देश में प्रगट हुई थी और ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं थी जो सत्यसन्देश में से और कुछ पढ़ें चाहे न पढ़ें पर आत्मकथा जरूर पढ़ते थे। सरकार की कृपा से सत्यसन्देश बन्द हो जाने पर सत्यसन्देश के पाठकों को, खासकर आत्मकथा के पाठकों को बड़ा खेद हुआ था; पर इससे एक लाभ यह हुआ कि जो आत्मकथा महिने महिने थोड़ी थोड़ी लिखी जाती थी वह लगातार लिखी जाकर एक साथ पूरी प्रकाशित हो रही है । आशा है पाठक इसका उपयोग करेंगे । -प्रकाशक
SR No.010832
Book TitleAatmkatha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSatya Samaj Sansthapak
PublisherSatyashram Vardha
Publication Year1940
Total Pages305
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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