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________________ ४ यामां कशव वैद्यनुं नाम प्राप्युं छे. वे त्रण प्रतोमां तपास करतां तेनुं तेज नाम निकलवाथी अमे आ पुस्तकमां केशव वैद्य नाम श्राप्यं बे. परंतु तत्त्वकेवली गम्य a. श्री पुस्तक बहु रसीक होवाथी प्रमारा श्रावक बंधुनए तेनुं गुजराती नाषांतर करी बपाववानी थमने भलामण करवायी श्रमे तेनुं श्रमारी विद्याशालाना शास्त्री हरिशंकर कालीदास पासे सरल गुजराती भाषामां भाषांतर करावी उपायुं बे, तेथी श्रमो जैनबंधुनने विनंती करीए बीये के, प्रापएने उत्तम धर्ममार्ग देखामवारूप आपला उपर उपकार करनारा पूर्वाचार्योए बहु प्रयासथी रचेलां संस्कृत पुस्तकोनां सरल गुजराती भाषांतरने वांचवानो लान लइ ते महात्माए करेला नपकारने जुली जवुं नही. 10 या पुस्तक उपाती वखते बहु कालजी राखवामां आवी बे तो पण हष्टिदोषी अथवा कानो, मात्रा, मीरुं नमी जवाथी थयेली मूल्योनुं शुद्धिपत्र पावल दाखल करयुं ने बतां जो कोइ बीजी भूल रही गइ होय तो तेने वांचनारा लऊन पुरुषोए कृपा करी सुधारी लेवुं. एज. ल. विद्याशाला. 1
SR No.010819
Book TitleRushimandal Vrutti Purvarddha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShubhvarddhansuri, Harishankar Kalidas Shastri
PublisherJain Vidyashala Ahmedabad
Publication Year1901
Total Pages487
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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