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________________ गगशास्त्र : तृतीय प्रकाश कोणा ने श्रीयक सारी बातें बतला दीं। उसे सुन कर श्रीयक ने सोचा कि 'आज पिता के वर का बदला मैंने अच्छी तरह ले लिया।' महामंत्री शकटाल की मृत्यु के बाद वररुचि राजा की सेवा में तत्पर रहता था। वह सदा राजकुल के प्रत्येक कार्य में उपस्थित रहता था । अत राजा और प्रजाजन उसे सम्मानपूर्वक देखते थे । एक समय नन्दराजा ने शकटाल मंत्री के गुणों का स्मरण करते हुए उदासीन-से बने हुए राजसभा में गद-गद स्वर से श्रीयक से कहा - 'इन्द्र की सभा में जैसे वृहस्पति है, वैसे ही मेरी सेवा में भक्ति शक्तिमान महाबुद्धिशाली महामंत्री शक्टाल था । परन्तु देवयोग से वह इस प्रकार चल बसा । सचमुच. उमके बिना मुझे यह राजसभा सूनी-सूनी-सी लगती है।' श्रीयक ने भी कहा-"देव ! आपकी बात बिल्कुल सत्य है । परन्तु इस विषय मे हम क्या कर सकते हैं ? यह मब करतूत मद्यपानरत पापी वररनि भट्ट की है।"राजा ने पूछा- "क्या यह मदिरापान भी करता है ?" श्रोयक ने कहा- . "देव ; कल ही: मैं आपको प्रत्यक्ष बता दूंगा।" इस कौतुक को देखने के लिये दूसरे दिन राजसभा में सभी पुरुष माये । उनमें से एक विश्वस्त व्यक्ति ने, जो पहले से समझाया हुआ था, सर्वप्रथम वररुधि को सुन्दर पद्म (कमल) दिया । उसी समय किसी ने दुरात्मा वररुचि को मदनफल का रस लगा कर दूसरा कमल भेंट किया । मी अदभुत सुगन्धि और इतनी सुन्दरता इस कमल में है ; भला यह कहाँ का होगा ?' यों कमल का बखान करते हुए राजा आदि सभी ने अपना-अपना कमल नाक के लगाया । वररुचि भटट ने भी सूघने की उत्सुकता में अपना कमल नाक के पाम रखा । कमल को सूघते ही रात को पी हुई चन्द्रदास-मदिरा की उसे कहई। "धिक्कार है! ब्राह्मण-जाति में मृत्यूदण्ड के योग्य मदिरापान करने वाले इस नराधम को ! इस प्रकार सबके द्वारा तिरस्कृत हो कर वररुचि सभा से बाहर निकल भागा । बाद में अपनी शुद्धि के लिए उसने ब्राह्मण-पण्डितों में प्रायश्चित्त मांगा । इस पर उन्होंने कहा-'मदिरापान के पाप की शद्धि उबलते हए गर्मागर्म शीशे का रम पीन के प्रायश्चित्त से ही हो सकती है।' वररुचि भी ब्राह्मणों द्वारा दी गई प्रायश्चित्त-व्यवस्थानुमार शीशे को एक हंडिया में गर्म करके उसे पी गया। उसके शरीर का आन्तरिक भाग गर्मागर्म शीश के पीने से कुछ ही देर में गल गया और उसके प्राणपखेरू उड़ गये । इधर स्थूलभद्र मुनि भी आचार्य श्रीसभूनिविजय के पास ज्ञान-दर्शन-चारित्र की आराधना करते हुए श्रुतसमुद्र में पारंगत हुए । वर्षावास निकट आते ही एक मुनि ने गुरुमहाराज श्रीसंभूतिविजय को वदना करके उनके सामने अपने अभिग्रह (सकल्प) का निवेदन किया - गुरुदेव ! मैं चार महीने उपवास करके सिंह की गुफा के द्वार पर काउम्सग्ग (ध्यान) में खड़ा रह कर वर्षावास बिताऊंगा।' दूसरे मुनि ने निवेदन किया कि मैं चार महीने उपवास करके दृष्टि विष मर्प की बांबी के पास काउस्सग करके रहूंगा। तीसरे मुनि ने चार महीने उपवास करके कुए की चौखट पर मडूकासन से काउस्सग्ग करके रहने का अभिग्रह निवेदित किया । तीनों साधुओं को अभिग्रह के योग्य जान कर गुरु महाराज ने आज्ञा दे दी। उम समय स्थूलभद्रमुनि ने गुरुमहाराज की सेवा में वंदन करके निवेदन किया--"प्रभो ! मैंने ऐसा अभिग्रह किया है कि मैं कामशास्त्र में कथित विचित्र करण, आसन आदि शृंगाररस-उत्तंजक चित्रो से परिपूर्ण कोशा वेश्या की चित्रणाला में तपश्चरण किये बिना परसयुक्त भोजन करते हुए चौमासे के चार महीने व्यतीत करूं गुरुमहाराज ने श्रुतज्ञान में उपयोग लगा कर देखा और स्थूलभद्र को उक्त अभिग्रह के योग्य जान कर अनुमति दे दी । अतः चारों साधु अपना-अपना मनोनीत अभिग्रह पूर्ण करने के लिए अपने-अपने मनोनीत स्थल पर पहुंच गये। स्थूलभद्र मुनि भी कोशा वेश्या के गहद्वार पर पहुंचे। कोशा को पता लगते ही बाहर निकाल कर वह हाथ जोड़ कर स्वागत के लिए उपस्थित हुई। कोशा ने मुनि को देख कर
SR No.010813
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPadmavijay
PublisherNirgranth Sahitya Prakashan Sangh
Publication Year1975
Total Pages635
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size48 MB
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