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________________ शङ्ककला शपदे श्रीउपदे 18. ओ। तं भद्द! मज्झ पुत्तो पढमो निरुविग्गओ विससु॥ ६१॥ तो सत्थरक्खवाले निरूविउ देवसालनयरम्मि । नीओ । समगंचिय दाविया य पडिवत्तिया रम्मा ॥२॥ ततः। कहकहवि तेहिं हरियं रायकुमारेहिं देव! मह हिययं । जह जण णिजणयनयरदेसवासस्स नो सरइ ॥ ६३ ॥ अत्थि पुण तस्स रन्नो धूया सिरिदेविकुच्छिसंभूया। लक्खणधरी सुरूवा । र्शनम्॥३४३॥ 8/ अणुया जयसेणकुमरस्स ॥६४ ॥ तुलियतिलोत्तमतेया कलाकलावम्मि सुट्ठ पत्तट्ठा । जणमणहरणसुचरिया कलावई सच्चवियनामा ॥६५॥ तीए अणुरूववरो गवेसिओ सबओ न उण लद्धो। चिंताणलेण उज्झंति तेण पियरो य भाया य ॥६६॥ अविय । जायंतिय दीणिम जणंति, जोयणसंपत्तिय, चिंतासायरि खिवहिं तवहिं परमंदिरि जंतिय । पियपरि४/ चत्त अहुंतपुत्त मणुतावहि जणयह, जम्मदिणिच्चिय नयण नीरु निंदिज्जइ धूयहं ॥ ६७ ॥ भणिओ तेहिं तओ हं भइ णीए लहसु किंचि वरमुचियं । जं बहुरयणा पुहवी तुमंपि बहहिंडणसहावो ॥ ६८॥ एवंति भणंतेणं मएवि लिहिओ इमीए पडिच्छंदो । तयणुण्णाओ कमसोहिज्जो गेहम्मि पत्तो म्हि ॥ ६९॥ फुरइ पुण मज्झ हियए एसा देवस्स चेव उचि६ यत्ति । नियसामियं पमोतुं रयणं को सहइ अन्नस्स? ॥७॥ कुलगिरिसमुन्भवाणं ठाणं रयणायरो हु सवियाणं । है मोत्तूण ससिं अन्नत्थ कत्थई घडइ किं जोण्हा? ॥७१॥ तं सोऊण णरिंदो ताहे चिंताउरो दढं जाओ। कह मज्झ 12 इमाए समं लहुमेव समागमो होही? ॥७२॥ एत्थंतरम्मि मज्झण्हसमयसूयाकरो सुरगिहेसु । संखरवो संजाओ पढियं * तह कालकहगेण ॥७३॥ उल्लसियतेयपयरो सुरो जणमत्थयं कमइ एसो। तेयगुणब्भहियाणं किमसज्झं जीवलोगम्मि? 8 ॥३४३॥ 8 ॥७४॥ सिंगारवुड्डिजणणी मणोरमा बहुमहसवसणाहा। देवच्चणेण लब्भइ लच्छी दइया य कमलच्छी ॥७५ ॥ NAGARSACRORNSREG SS.
SR No.010796
Book TitleUpdeshpad Mahagranth Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPratapvijay
PublisherMuktikamal Jain Mohan Mala
Publication Year1979
Total Pages1008
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size45 MB
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