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________________ रह श्रीउपदे- शपदे श्रीवनस्वामिचरितम् ॥१२४॥ OSSSUISSESDES 548 रिसा? ॥२४३॥ सीहगिरी दिन्नगणो वइरस्स समागयम्मि समयम्मि । कयभत्तपरिच्चाओ जाओ देवो महिडीओ ॥२४४ ॥ भयपि वइरसामी सएहिं पंचहिं मुणीण परियरिओ । कुणइ विहारं सो जत्थ (तत्थ) तत्थुच्छलंति रवा ६॥२४५ ॥ उराला सयल वियक्खणाण संजणियमाणसाणंदा । जह अच्चभुयगुणरयणभायणं संपइ इमो त्ति ॥ २४६॥ अह अस्थि कुसुमनयरे धणसिट्ठी सुवपावियपइट्ठो। भज्जा तस्स मणुजा लज्जासोहग्गगुणगेहं ॥२४७॥ अह ताण सुया नियदेहरूवलच्छीए च्छिन्नमाहप्पा । सुरसुंदरीणवि नवं जोवणमोरालमणुपत्ता ॥ २४८ ॥ जाणाणं सालाए तस्स ठिया टू साहुणीओ पइदिवसं । वइरस्स गुणे सरइंदुनिम्मले संथुणंति जहा ॥ २४९॥ एस अखंडियसीलो बहुस्सुओ एस एस पसमड्डो । एसो य गुणनिहाणं एयसरिच्छो परो नत्थि ॥ २५०॥ "द्वावेतौ पुरुषौ लोके परप्रत्ययकारको । स्त्रियः कामितकामिन्यो लोकः पूजितपूजकः॥१॥" इय वयणमणुसरंती सा दढमणुरागतप्परा जाया । वइरम्मि वइरदढमाणसम्मि पियरं भणइ एवं ॥ २५१॥ जइ मे वइरो भत्ता होजं तो हं भयामि वीवाहं । अन्नह पजलियजलणोवमेहिं भोगेहि नो कज्जं ॥ २५२ ॥ उत्तमकुलसंभूया उति वरगा न इच्छई सा उ । साहति साहुणीओ जहा न वइरो विवाहेइ ॥ २५३ ॥ सा भणइ जइ न वीवाहमेस कुणइ अहंपि पवजं । घेच्छामि निच्छओ तीए एस ठविओ नियमणम्मि ॥ २५४ ॥ भयवंपि वइरसामी पाडलिपुत्तं कमेण संपत्तो । तुहिणुजलतज्जसपसरसवणरंजियमणो राया ॥२५५॥ नियपरियणसंजुत्तो समागओ संमुहो निभालेइ । फड्डगपड्डुगरूवेण साहुणो नगरमभिइंते ॥ २५६ ॥ तत्थोरालसरीरो ॐ वहवे पासइ मुणी मणुयनाहो । पुच्छइ किमेस भयवं इमो व ते विंति नहु अन्नो ॥२५७ ॥ एवं पुप्फुल्लविलोयणेण PASSASSHRSSIRSAR ॥१२४॥
SR No.010796
Book TitleUpdeshpad Mahagranth Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPratapvijay
PublisherMuktikamal Jain Mohan Mala
Publication Year1979
Total Pages1008
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size45 MB
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