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________________ (६३०) ॐ अथ श्री संघपट्टका वाणी होय तो ते पण न बोलवी. एवी आशंका करी तेनो नत्तर कहे . जे हेतु माटे आ जैन वे एवी ब्रांतिये करीने साधु, साध्वो, श्रावक, श्राविका तथा चैत्य इत्यादि वाह्यथी आकार मात्रने देखी. ने आ अरिहंतनुं प्रवचन वे ए प्रकारे मिथ्या झाने करीने लिंगधारी आदिक पुरूषो तत्वथी जैनी नथी. केम जे पूर्वे कयु ए प्रकारे ते लिंगधारीउने जैनीपणानुःखंगन कर्यु ने ए हेतु माटे. टीकाः-ततो यथा हृत्पूरपूरितोदराः सकलमुपलादिजालं कांचनतयाऽध्यवास्यंति तथा तेपि जमा कुवासनावासितांतःकरणा वस्तुतोऽनाहतमप्येतत् लिंगिवाहतमिति विपर्यस्यंतीति नवति जैनन्त्रांतिः ॥ अर्थ:--जेम कोक ते पाषाणना समूहने श्रा सोनानो ढगलो ने ए प्रकारनो निश्चय करे तेम नगरी वासनावमे जेमनां अंतःकरण वासनावालां थयां बे एवा जम पुरुषो वस्तुताए श्रा लिंगधारी मार्ग अरिहंत संबंधी नथी. तो पण ते मार्गने थ. रिहंतनो जाणे ठे एज जैनपणानी ब्रांति ले. टीका:-तया कुपथपतितान् कुमार्गप्रस्थितान् नन् मा. नवान् प्रेक्ष्य अवलोक्य तत्प्रमोहापोहाय कुपथपतितनरप्रागुक्त प्रवल मिथ्याज्ञानापनोदाय इदं एतटिलगिनां मिथ्यापथस्वरूपं. किमपि दिगमात्रं सकलस्य तस्याग्दिर्शिनिर्जिव्हाशतेनापि वक्तुमशक्यत्वात् ॥
SR No.010774
Book TitleSanghpattak
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinvallabhsuri
PublisherJethalal Dalsukh Shravak
Publication Year1907
Total Pages703
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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