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________________ (३०३) - अथ श्री संघपट्टक M .. अर्थ-वळी आगमने विषे साधुने पण पोताना संप्रदायथी चौल्यो आवेलो एवो निर्गुण गच्छ तेनो परित्याग करवो एम सांजकीए बीए ए हेतु माटे गबनो ममत्व त्याग करीने शुन्न गुरु थकी सकर्म पामवो जे माटे ते वात शास्त्रमा कही में जे. टीका-एवंच यदा कृतदिंगबंधानामपि यतीनां निर्गुणगड परिहारः पतिपादित स्तदा का कथा श्राद्धानामिति ॥ तदेवं विधानामपि य गस्थितिनिया तेषां न सकर्माज्युपगम स्तदहो बलीयसी गनमुना तिरयति विवेकांकुरं ॥ . ॥ यमुक्तं ॥ जीवाः प्रमादमदिरा हृतहृयविद्या अप्यन्यथा सुपथिसंप्रति नोत्सइंते ॥ हामऊनाय तु जवांजसि लिंग निः किंगच्च स्थिति विनिहतेव गले शिलैषा ॥ तद्च्छ. स्थितेरपि बिच्यतो धर्मान धिकारिण ए वतेवराकाथनात्मनीना असमर्थत्वात् समर्थस्यैवहिशास्त्रे तत्थ हिगारी अच्छी समत्थश्रो इत्यादिना धर्माधिकारित्व प्रतिपादनात् ।। समर्थस्यैवंलक्षणत्वात् ॥ होश समत्थो धम्मकुणमाणो जो न वाहश्परसिं। माइपिश्सामिगुरु माश्याण धम्मेण निन्ना।तद्यवस्थितमेतत् कंब्रम इत्यादीतीवृत्तार्थः१४ अर्थः-एम ज्यारे को दे दिग्बंध ते जेमणे एवा साधुने पण निर्माण गच्छमां रहेवानो निषेध कर्यो त्यारे श्रावकने निर्गुण ग
SR No.010774
Book TitleSanghpattak
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinvallabhsuri
PublisherJethalal Dalsukh Shravak
Publication Year1907
Total Pages703
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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