SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 487
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ पत्र ४३५१ विविध पत्र आदि संग्रह-२७वा वर्ष ___ अनेक जीवोंकी अज्ञान दशा देखकर-तथा वे जीव अपना कल्याण करते हैं अथवा अपना कल्याण होगा, इस प्रकारकी भावनासे अथवा इच्छासे, उन्हें अज्ञान-मार्ग प्राप्त करते हुए देखकर-- उसके लिये अत्यंत करुणा होती है, और किसी भी प्रकारसे इसे दूर करना ही योग्य है, ऐसा हो आता है । अथवा उस प्रकारका भाव चित्तमें वैसाका वैसा ही रहा करता है, फिर भी वह जिस प्रकार होने योग्य होगा उस प्रकारसे होगा, और जिस समय वह बात होने योग्य होगी उस समय होगी यह बात भी चित्तमें रहा करती है। क्योंकि उस करुणाभावका चितवन करते करते आत्मा बाह्य माहात्म्यका सेवन करे, ऐसा होने देना योग्य नहीं; और अभी कुछ उस प्रकारका भय रखना योग्य लगता है। हालमें तो प्रायः दोनों ही बातें नित्य विचारनेमें आती हैं, फिर भी बहुत समीपमें उसका परिणाम आना संभव नहीं मालूम होता, इसलिये जहाँतक बना वहाँतक तुम्हें नहीं लिखा अथवा कहा नहीं है। तुम्हारी इच्छा होनेसे वर्तमानमें जो स्थिति है, उसे इस संबंधमें संक्षेपसे लिखी है; और उससे तुम्हें किसी भी प्रकारसे उदास होना योग्य नहीं, क्योंकि हमें वर्तमानमें उस प्रकारका उदय नहीं है, परन्तु हमारा आत्म-परिणाम उस उदयको अल्पकालमें ही दूर करनेकी ओर है । अर्थात् उस उदयकी काल-स्थिति किसी प्रकारसे अधिक दृढ़तासे वेदन करनेसे घटती हो तो उसे घटानेमें ही रहती है । बाह्य माहात्म्यकी इच्छा आत्माको बहुत समयसे नहीं जैसी ही हो गई है । अर्थात् बुद्धि बाह्य माहात्म्यको प्रायः इच्छा करती हुई नहीं मालूम होती, फिर भी बाह्य माहात्म्यके कारण, जीव जिससे थोड़ा भी परिणाम-भेद प्राप्त न करे, ऐसी स्वस्थतामें कुछ न्यूनता कहनी योग्य है; और उससे जो कुछ भय रहता है, वह तो रहता ही है; जिस भयसे तुरत ही मुक्ति होगी, ऐसा मालूम होता है । प्रश्नः-यबपि सोनेकी आकृतियाँ जुदी जुदी होती हैं, परन्तु यदि उन आकृतियोंको आगमें ढाल दिया जाय तो वे सब आकृतियाँ मिटकर एक केवल सोना ही अवशेष रह जाता है, अर्थात् सब आकृतियाँ जुदे जुदे द्रव्यत्वका त्याग कर देती हैं, और सब आकृतियोंकी जातिकी सजातीयता होनेसे वे मात्र एक सोनेरूप द्रव्यत्वको प्राप्त होती हैं। इस तरह दृष्टांत लिखकर आत्माकी मुक्ति और द्रव्यके सिद्धांतके ऊपर जो प्रश्न किया है, उस संबंधमें संक्षेपमें निम्न प्रकारसे कहना योग्य है। उत्तर:-सोना औपचारिक द्रव्य है, यह जिनभगवान्का अभिप्राय है; और जब वह अनंत परमाणुओंके समुदायरूपसे रहता है, तब चक्षुगोचर होता है। उसके जो जुदा जुदा आकार बन सकते हैं, वे सब संयोगसे होनेवाले हैं, और उनका जो पीछेसे एकरूप किया जा सकता है वह भी उसी संयोगजन्य है । परन्तु यदि सोनेके मूल स्वरूपका विचार करते हैं तो वह अनंत परमाणुओंका समुदाय है । जो प्रत्येक अलग अलग परमाणु हैं, वे सब अपने अपने स्वरूपमें ही रहते हैं । कोई भी परमाणु अपने स्वरूपको छोड़कर दूसरे परमाणुरूपसे किसी भी तरह परिणमन करने योग्य नहीं, मात्र उन सबके सजातीय होनेके कारण और उनमें स्पर्श गुण होनेके कारण उस स्पर्शके सम-विषम संयोगमें उनका मिलना हो सकता है, परन्तु वह मिलना कोई इस प्रकारका नहीं कि जिसमें किसी भी परमाणुने
SR No.010763
Book TitleShrimad Rajchandra Vachnamrut in Hindi
Original Sutra AuthorShrimad Rajchandra
Author
PublisherParamshrut Prabhavak Mandal
Publication Year1938
Total Pages974
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, N000, & N001
File Size86 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy