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________________ २४४ भीमद् राजबन्द्र [पत्र १९४, १९५ परमात्माके लक्षकी दृष्टिसे तो यह सरलता ही है, और ऐसा ही हो । ऋभु राजाने कठोर तप करके परमात्माका आराधन किया; परमात्माने उसे देहधारीके रूपमें दर्शन दिया, और वर माँगनेके लिये कहा । इसपर ऋभु राजाने वर माँगा कि हे भगवन् ! आपने जो ऐसी राज्यलक्ष्मी मुझे दी है, वह बिलकुल भी ठीक नहीं; यदि मेरे ऊपर तेरा अनुग्रह हो तो यह वर दे कि पंचविषयकी साधनरूप इस राज्यलक्ष्मीका फिरसे मुझे स्वप्न भी न हो । परमात्मा आश्चर्यचकित होकर 'तथास्तु' कह कर स्वधामको पधार गये। कहनेका आशय यह है कि ऐसा ही योग्य है; कठिनता और सरलता, साता और असाता ये भगवान्के भक्तको सब समान ही हैं। और सच पूछो तो कठिनाई और असाता तो उसके लिये विशेष अनुकूल हैं, क्योंकि वहाँ मायाका प्रतिबंध दृष्टिगत नहीं होता। ___आप तो यह बात जानते ही हैं; तथा कुटुम्ब आदिके विषयमें कठिनता होना ही ठीक नहीं है, यदि ऐसा लगता हो तो उसका कारण यही है कि परमात्मा ऐसा कहते हैं कि 'तुम अपने कुटुम्बके प्रति स्नेह रहित होओ, और उसके प्रति समभावी होकर प्रतिबंध रहित बनो, वह तुम्हारा है ऐसा न मानो, और प्रारब्ध योगके कारण ऐसा माना जाता है; उसके हटाने के लिये ही मैंने यह कठिनाई भेजी है'। अधिक क्या कहें ? यह ऐसा ही है। १९४ बम्बई, फाल्गुन १९४७ सत्स्वरूपको अभेद भक्तिसे नमस्कार वासनाके उपशम करनेके लिये उनकी सूचना है; और उसका सर्वोत्तम उपाय तो ज्ञानी पुरुषका योग मिलना ही है । दृढ़ मुमुक्षुता हो और कुछ कालतक वैसा योग मिला हो तो जीवका कल्याण हो जाय । तुम सब सत्संग, सत्शास्त्र आदिके विषयमें अभी कैसे ( योगसे ) रहते हो, यह लिखना । इस योगके लिये प्रमादभाव करना बिलकुल भी योग्य नहीं है । हाँ, यदि पूर्वका कोई गाढ़ प्रतिबंध हो तो आत्मा इस विषयमें अप्रमत्त हो सकती है । तुम्हारी इच्छापूर्तिके लिये कुछ भी लिखना चाहिये, इस कारण प्रसंग मिलनेपर लिखता हूँ। बाकी तो अभी हालमें सत्कथा लिखी जा सके, ऐसी दशा (इच्छा ! ) नहीं है। १९५ बम्बई, फाल्गुन १९४७ अनंतकालसे जीवको असत् वासनाका अभ्यास है । उसमें सत्का संस्कार एकदम स्थित नहीं होता । जैसे मलिन दर्पणमें जैसा चाहिये वैसा प्रतिबिम्ब नहीं पड़ सकता, वैसे ही असत् वासनायुक्त चित्तमें भी सत्का संस्कार योग्य प्रकारसे प्रतिबिम्बित नहीं होता; कुछ अंशसे ही होता है । वहाँ जीव फिर अपने अनंतकालके मिथ्या अभ्यासके विकल्पमें पड़ जाता है, और इस कारण उन सत्के अंशोंपर भी कचित् आवरण छा जाता है। सत्संबंधी संस्कारोंकी दृढ़ताके लिये सब प्रकारकी
SR No.010763
Book TitleShrimad Rajchandra Vachnamrut in Hindi
Original Sutra AuthorShrimad Rajchandra
Author
PublisherParamshrut Prabhavak Mandal
Publication Year1938
Total Pages974
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, N000, & N001
File Size86 MB
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