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________________ १४ सनातन जैनग्रंथमाला। इस प्रथमालामें सव प्रथ संस्कृत, प्राकृत, व सस्कृत टीकासहित ही छपते है। यह प्रथमाला प्राचीन जैनप्रथोंका जीर्णोद्धार करके सर्वसाधारण विद्वानोंमें जैनधर्मका प्रभाव प्रगट करनेकी इच्छासे प्रगट की जाती है। इसमें सब विषयों के अथ छपेंगे। प्रथम अंकमें सटीक आप्तपरीक्षा और पत्रपरीक्षा छपी है। दूसरे अकमें समयसारनाटक दो सस्कृत टीकाओंसहित छपा है । तीसरे अकमें अकलदेवका राजवार्तिक छपा है। चौथे अकमें देवागमन्याय वसुनदिटीका और अष्टशतीटीकासहित और पुरुषार्थसिद्धयुपायसटीक छपेगा। इसके प्रत्येक अकमें सुपररायल ८ पेजी १० फारम ८० पृष्ट रहेंगे। समयसारजी ४ अंकोंमें पूरा होगा। इनके पश्चात् राजवार्तिकजी व पद्मपुराणजी वगैरह बड़े २ प्रथ • छपेंगे। १२ अककी न्योछावर ८) रु. है। डाक खर्च जुदा है। प्रत्येक अक डाकखर्चके वी. पी. से भेजा जायगा। यह प्रथमाला जिनधर्मका जीर्णोद्धार करनेका कारण है। इसका प्राहक प्रत्येक जैनीभाई व मदिरजीके सरस्वतीभडारको बनकर सब प्रथ सग्रह करके सरक्षित करना चाहिये और धर्मात्मा दानवीरोंको इकठे अथ मंगाकर अन्यमती विद्वानोंको तथा पुस्तकालयोंको वितरण करना चाहिये। चुन्नीलालजैनग्रंथमाला। इस प्रथमालामें हिन्दी, बगला, मराठी और गुजराती भाषामें सव तरहके छोटे छोटे प्रथ छपते हैं। जो महाशय एक रुपिया डिपाजिटमें रखकर अपना नाम स्थायी ग्राहकोंमें लिखा लेंगे, उनके पास इस ग्रन्थमालाके सब प्रथ पौनी न्योछावरमें भेजे जायगे और जो महाशय इस सस्थाके सहायक है उनको एक एक प्रति विना मूल्य भेजी जायगी। मिलनेका पता-पन्नालाल बाकलीवाल, मत्री-भारतीय जैनसिद्धान्तप्रकाशिनी सस्था, ठि. मेदागिनी जैनमदिर बनारस सिटी।
SR No.010718
Book TitleJain Hiteshi
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages373
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size13 MB
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