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________________ ११६ सुभाषितमञ्जरी तप से पाप नष्ट होते हैं तपोभेषजयोगेन जन्ममृत्युजरारुजः । पञ्चाक्षारातिभिः सार्धं विलीयन्तेऽघराशयः ॥२८॥ अर्था:- तपरूपी औषध के योग से जन्म, मृत्यु और जरा रूपी रोग तथा पापों के समूह पञ्चेन्द्रिय रूपी शत्रुओं के साथ विलीन हो जाते है ॥२८॥ ___ तप से मुक्ति सुलभ है तपः करोनि यो धीमान मुक्तिश्रीरञ्जिताशयः । स्वर्गो गृहाङ्गणस्तस्य राज्यसौख्यस्य का कथा ॥२८८॥ अर्थः- मुक्तिरूपी लक्ष्मी मे अनुरक्तचित्त होकर जो बुद्धिमान् तप करता है उसे स्वर्ग घर का आंगन है, राज्य सुख की क्या कथा है ? अर्थात् वह तो प्राप्त होता ही है ॥२८॥ तप का बल सबसे श्रेष्ठ बल है लोकत्रयेऽपि तन्नास्ति तपसा यन्न साध्यते । चलानां हि समस्तानां स्थितं मन्धि तपोबलम् ।।२८६।। अर्था:- तीनों लोकों मे वह वस्तु नहीं है जो तप से सिद्ध न होती हो । यथार्थ में तप का बल सब बलों के शिर पर स्थित है-सब बलों मे श्रेष्ठ है ॥२६॥
SR No.010698
Book TitleSubhashit Manjari Purvarddh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAjitsagarsuri, Pannalal Jain
PublisherShantilal Jain
Publication Year
Total Pages201
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size5 MB
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