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________________ स्तवनावली। १२७ लेशुं शिव पटराणी ॥ प्रजु ॥३ ।। शांति जिनेश्वर साहिब मेरा, शरण लीया में तेरा । कृपा करी मुज टालो साहिब, जनम मरणना फेरा ॥ ॥ प्रजु ॥४॥ तन मन धीर करे तुम ध्याने, अंतर मेल ते वामे । वीरविजय कहे तुम सेवनथी, आतम आनंद पामे ॥ प्रनु ॥ ५ ॥ श्रीकुंथु जिन स्तवन । ॥ राग लावणी ॥ कुंथु जिनेश्वर तुं परमेश्वर, तेरी अजब गति कहिये। कुंथु कुंजरथी धारके करुणा जिन पदवी लहिये ॥ कुंण् ॥ लख चौरासी जीव जोनीमें, हमको रखना ना चश्ये । ए दिलमें धारी तारके सरणा जिनवरका दश्ये ॥ कुं० ॥ ५ ॥ शांग धारक त्रिजुवन नाचो, नरग निगोदे पुःख सहिये । ए दिलकी बातां सुखसे तुम विन किस आगे कहिये ॥ कुंग ।। ३ ।। प्रज्जु मुज तारो पार उतारो, गुण अवगुण तो ना लहिये । ए धरम काममें नाथकुं ढीलको करना ना चश्ये ॥ कुं० ॥ वीरविजयकी एही अरज है, आतम
SR No.010687
Book TitleAtmanand Stavanavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKarpurvijay
PublisherBabu Saremal Surana
Publication Year1917
Total Pages311
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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