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________________ षष्टम् सर्ग : अभिनिष्क्रमण एवं तप ११ जबकि भरता वह भयंकर, प्राण-हर फुफकार। 'तवं विहग, पशु और नर-तन, शीघ्र होते क्षार ॥ इसलिए उस पोर जाता है न कोई पात्र । जा सकी उस ओर बस वह, वायु गतिमय मात्र ।' बोर किञ्चित मुस्कराये, फिर हुए गतिमान । प्रान्त वह करने अभय वे. चल दिये तिवान ॥ सोचते-विषधर भयङ्कर, किन्तु है बलवान । क्रूरता उसको नशे तो, हो अमित कल्याण ॥ प्राणियों के ध्वंश में जो, शक्ति होती नष्ट । वह न बदली जा सके क्या, प्रात्म, जग के इष्ट । मैं डरूं क्यों आत्म चिर है, देह जड़ है और। 'जो कि निश्चय नष्ट होगी, काल का है कौर ।' 'सोचते यों हो गए उस, मार्ग पर प्रतिवीर । नाग-बिल सनिकट जा तप-रत हुए गम्भीर ।। 'चकौशिक सर्प इनको, देख कुद्ध अपार । भर उठा भीषण धुआं-सो, विषमयो फुकार ॥ लो विषला हो गया थल, वृक्ष का पतझार । कर सका पर आत्म योगो, का न वह अपकार ।। और इस परं कुद्ध विष घर, जान अपनी हार । वह चला करने जटिलतम, दन्त का दुर्वार॥ पर न इससे लच. सको वह प्रात्म-शक्ति प्रसीम । योग में सब शान्त होते, अणु ज्वलित निस्सीम ॥
SR No.010568
Book TitleTirthankar Bhagwan Mahavira
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVirendra Prasad Jain
PublisherAkhil Vishwa Jain Mission
Publication Year1965
Total Pages219
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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