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________________ १५७ श्री जैनहितोपदेश-भाग २ जो. वानी पूर्ण अभिलाषा वर्ते छे. एवी मारी उच्चः अभिलाषा सफळ __ थाय माटे सर्वज्ञ मभुनी कृपा.साथे तारी सतत सहाय मागु छु. - सुमंति-माराथी बनी शके ते सर्व सहाय समर्पवा हुँ सेवामां सदा तत्पर छ अने खरा जीगरथी इच्छु छ के आपनी आवी उच्च अभिलाषा शीघ्र फलीभूत थाओ! चारित्र-प्रिये ! तारी सत्संगतिथी हुँ दिनप्रतिदिन अपूर्व आनंद अनुभवतो जाउं छं तेथी मने खात्री थाय छे के मारी उच्च अभिलाषा एक दिवसे सफळ-थाशेज! हाल तो मने धर्मना पवित्र अंगभूत अवशिष्ट रहेला तपनु स्वरुप जाणवानी प्रबळ इच्छा वर्ते छे. तेथी तेनु कंइक विशेष स्वरुप समजावीने समाधान कर घटेछे, सुमति-जेथी पूर्व संचित कर्ममळ दग्ध थइने क्षय पामे तेनु नाम तप छे. अनादि अज्ञानना योगथी विविध विषयमां भटकता मननो अने इंद्रियोनो निरोध करी सहज स्वभावमा स्थित था तेज खरो तप छे. ते तपना ६ बाह्य अने ६ अभ्यंतर मळीने १२ भेद छे, जे खास लक्षमा राखवा जेवा छे. आत्म विशुद्धि करवाना कामी जनोने ते सर्वे अत्यंत हितकारी छे. तेमांथी प्रथम ६ वाह्यमेदनु किंचित् स्वरुप कहुं हुं. १: अनशन-सर्व प्रकारना अन्न-पाणी विगेरे भोज्य पदा- अॅनो अमुक वखत सुधी अथवा कायमना माटे त्याग . . करीने सहज संतोष राखयो ते..
SR No.010503
Book TitleJain Hitopadesh Part 2 and 3
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKarpurvijay
PublisherJain Shreyaskar Mandal Mahesana
Publication Year1908
Total Pages425
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size14 MB
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