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________________ H UMIHIRGURULUMINOUNTS. A DHEHARRIOmant पतितोदारक मैनधर्म । किससे नहीं होती ? गलतीको सुधार लेना ही बुद्धिमत्ता है । अब कोई गलती सुधारनेको तत्पर हो तो क्या उसे रोकना ठीक होगा !' मधु-नहीं महाराज ।' आ०- बस, पापमोचन करने के लिये धर्मकी आराधना प्रत्येक मनुष्यको-चाहे वह स्त्री हो या पुरुष करने देना चाहिये । कौशाम्बीके राजा सुमुखकी कथा क्या तुमने नहीं सुनी ?' मधु-'महाराज ! उनकी क्या कथा है " आo-' उनकी कथा भी तुम जैसी है। सुनो-कौशाम्बीमें जा राजा सुमुख राज्य करता था तब वहा वीरक नामका सेठ म्हता था । सेठको पत्नी वनमाला अत्यन्त रूपवती थी। सुमुखने वनमालाको देखा और वे दोनों एक दूसरेपर आसक्त होगये । वनमाला वीरकको छोड़ कर सुमुखके पास चली आई और उसकी गनी बनकर रहने लगी ! वनमाला और सुमुखने विवाहकी पवित्रताको अवश्य नष्ट कर दिया; किन्तु फिर भी उन्होंने अपनी विषयवासनाको पशुतुल्य असीम नहीं बनाया दाम्पत्य जीवनको उन्होंने महत्व दिया । पति-पत्नीरूप वे धर्ममेवन करने में अपना समय और शक्ति लगाने गे। तपोधन ऋषियोंकी उन्होंने पूजा-वंदना की और उन्हें आहारदान देकर महत् पुण्य संचय किया । परिणाम स्वरूप वे दोनों महापातकी भी उम पुण्य प्रभावसे मरकर विद्याधर और विद्याधरी हुये । राजन् ! धर्मकी आगधना निष्फल नहीं जाती । जिसने पाप किये है उमे तो और भी अधिक धर्मको पालना चाहिये । तुमने यह अच्छा विचार किया है। 'आओ, मुनित्रत अंगीकार करो और गों का नाश कर डालो।
SR No.010439
Book TitlePatitoddharaka Jain Dharm
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamtaprasad Jain
PublisherMulchand Kisandas Kapadia
Publication Year
Total Pages220
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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