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________________ महावीर का अन्तस्तल [ १७० मुझे खड़ा देखकर मेरे लिहाज से उनने गोशाल को छोड़ दिया । गोशाल मेरे साथ आगया । पर मन ही मन वह भनभनाता रहा। अपनी दुष्कृति का दुष्परिणाम देखकर उसे पश्चात्ताप होना चाहिये था पर गोशाल के चेहरे से ऐसा नहीं मालूम हुआ । सम्भवतः असमें प्रतिक्रिया होरही थी । थोड़ी देर बाद उस प्रतिक्रिया का परिचय भी मिला । आगे चलने पर एक गोचर भूमि मिली। जहां बहुत से ग्वाले गायें चरा रहे थे । गोशाल भन्नाया हुआ तो था ही, ग्वालों को उपटता हुआ बोला- अरे, ओ वीभत्स म्लेच्छो, जानवरों के साथियो ! बोलो यह मार्ग कहां जाता है ? ग्वालने कहा- किस तरह बोलता है रे साधुड़ा ! गाली क्यों बकता है ? गोशाल ने कहा- अरे दासीपुत्रा, सच बोलने से बिगड़ते क्यों हो ? क्या तुम बीभत्स नहीं हो, क्या जानवरों के साथ नहीं रहते ? तब सच बोलने में गाली क्या हुई ? ग्वालों ने उसकी बात का उत्तर न दिया । कुछ तरुण ग्वाल लट्ठ लेकर उसकी तरफ दौड़े, पर कुछ वयस्क ग्वालों ने वचालिया । आगे बढ़ने पर मैंने गोशाल से कहा- भाई, तुम सत्य का रूप नहीं समझते । गोशाल तो क्या मैंने झूठ कहा था ? क्या वे सब जानवर के साथी नहीं थे ? बीभत्स नहीं थे ? मैं थे, फिर भी तुम्हारा कहना उसे कहते हैं जिससे अपनी और दुनिया तुम्हारे इस बोलने से न तो दुनिया की भलाई हुई । तथ्य होने से ही सत्य नहीं सत्य नहीं था । सत्य की भलाई हो । परन्तु भलाई हुई न तुम्हारी होजाता, वह हितकर
SR No.010410
Book TitleMahavira ka Antsthal
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSatyabhakta Swami
PublisherSatyashram Vardha
Publication Year1943
Total Pages387
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size12 MB
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