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________________ चतुर्थलम्भ २७३ चञ्चल जलने जिसका वस्त्र दूर कर दिया था और जो अपनी कान्तिसे स्फटिकके पटियेको जीत रहा था ऐसे स्थूल नितम्ब मण्डलपर नखाघात के बहाने जो मानो कामदेव के जगद्विजयकी प्रशस्तिके अक्षर ही धारण कर रही थी ऐसी कोई स्त्री मूंगाके यन्त्र से निकलनेवाली जलवारा बड़े हर्प के साथ अपने पति के मुखपर बरसा रही थी । उस जलधारा में उसके हाथकी लाल-लाल कान्ति मिल रही थी इसलिए ऐसी जान पड़ती थी मानो हाथोंके मसलनेसे प्रकट हुई रक्तकी धारा ही हो अथवा केशरका रस ही हो । कोई एक युवा पास जाकर अपनी स्त्रीके स्तन रूपी कुड्मलके अग्रभागको पानीसे सींच रहा था जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो वह उसके हृदय स्थल में उत्पन्न हुए रागरूपी कल्पवृक्षकी वृद्धि ही चाहता था ॥ १६ ॥ कोई एक स्त्री अपने पतिको धोखा देकर सखीके साथ मुहूर्त भरके लिए पानी में डूबा साध गई परन्तु उसके शरीरकी सुगन्धिके लोभसे मँडराते हुए भ्रमरोंसे उसका पता चल गया और पतिने उसका आलिङ्गन कर लिया ||२१|| जिसके स्तन कमलकी वोड़ियोंके समान थे, कोमल भुजाएँ मृणालके समान थीं और मुख फूले हुए कमलके समान था ऐसी सुन्दररूपको धारण करनेवाली कोई स्त्री जब कमलिनियोंके बीच में पहुँची तब अलगसे पहिचाननेमें नहीं आई ||२२|| नदीका पानी स्त्रियोंके सघन केश-बन्धनसे गिरे हुए फूलोंके द्वारा तारकित - ताराओंसे युक्त जैसा हो रहा था और उसके बीचमें तरुण-जनरूपी चकोरोंके द्वारा देखा गया किसी स्त्रीका मुख चन्द्रमा हो रहा था - चन्द्रमाके समान जान पड़ता था || २३॥ इस प्रकार नगरके तरुण जन जलक्रीड़ामें तत्पर थे। तब नदी तटकी अलंकारभूत, कुबेर मित्र और कुवेरदत्त नामक समुद्रोंसे समुत्पन्न गुणमाला और सुरमञ्जरी नामक दो कन्यारत्नों में चन्द्रोदय और सूर्योदय नामक सुगन्धित चूर्णकी उत्कृष्टताको लेकर स्पर्धा बढ़ रही थी । उन दोनों प्रतिज्ञा की थी कि हम दोनोंके बीच जो पराजित होगी वह नदीके जलमें स्नान नहीं करेगी। ऐसी प्रतिज्ञा कर दोनोंने अपनी-अपनी दासियाँ छोड़ीं और वे दासियाँ चूर्ण लेकर जहाँ तहाँ विचार करती हुई क्रमसे जीवन्धरके निकट आई और पूछने लगीं कि इन चन्द्रोदय और सूर्योदय में अच्छा कौन हैं ? जीवन्धर स्वामीने चन्द्रोदय चूर्णको अच्छा कहा और दूसरे चूर्णको वर्षाकालके योग्य बतलाया । बतलाया ही नहीं उन्होंने चन्द्रोदय चूर्णको आकाशमें फूँककर और उसपर मँडराते हुए भौंरे दिखाकर इसका प्रत्यय भी करा दिया || २४|| तदनन्तर कुरुवंशके शिरोमणि जीवन्धर कुमारको नमस्कार कर और उनको स्तुतिकर दोनों दासियाँ वापिस लौट गई और उन्होंने वेगसे अपनी-अपनी मालकिनों के पास जाकर सब समाचार ज्योंका-त्यों सुना दिया ||२५|| दोनों चूक सुगन्धि एक समान होनेपर भी जीवन्धर स्वामीने गुणमालाके चन्द्रोदय चूर्णको अच्छा बतलाया था इसका सुरमञ्जरीको बहुत शोक हुआ ||२६|| चन्द्रोदयने (पक्षमें चन्द्रमाके उदयने) गुणमाला के मुखरूपी कमलको विकसित कर दिया था और सूर्योदयने ( पक्ष में सूर्य के उदयने) शीघ्र ही सुरमञ्जरीका मुख कमल सुखा दिया था यह विचित्र बात थी ||२७|| तदनन्तर पराभवसे उत्पन्न हुई बहुत भारी ईर्ष्यासे जिसका चित्त कलुषित हो रहा था ऐसी सुरमञ्जरी गुणमाला सखीके द्वारा अनेक प्रार्थना किये जाने पर भी बिना स्नान किये ही लौट गई तथा जीवन्धरके सिवाय अन्य मनुष्यको देखूँगी भी नहीं यह प्रतिज्ञाकर रोषसे अन्धी होती हुई कन्या - गृहमें चली गई । जिसप्रकार चांदनी वियोगसे प्रातःकालकी कमलिनी शोक करती है उसी प्रकार सखीके वियोगसे गुणमालाने शोक किया ||२८|| ३५
SR No.010390
Book TitleJivandhar Champu
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1958
Total Pages406
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size52 MB
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