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________________ नंद बहुत्तरी सवे नयर सिरि सेहरी, पुर पाडली प्रसिद्ध । - . गढ मह मंदिर सपत भुंइ, सुभर भरी समृद्ध ।।१।। सूरवीर आरणा अटल, अरियण कंद निकंद । राजत है राजा' तहां, नंदराइ आनन्द ॥२॥ तासु प्रधान प्रधान गुण, वीरोचन वरीयाम । एक दिवस राजा चल्यौ, ख्याल करण आराम ॥३॥ कटक सुभेट परिवार सुं, चढ्यौ राइ सरपाल । वस्त्र देखि तहां सूकते, ऊभी रह्यौ छंछाल ॥४॥ इक सारी तिहि वीच परी, भमर करत गंजार । नृप चिंते या पहिरि है, साइ पद्मणि नारि ।।५।। सास सुवास सुवास तनु, दामणि ज्यं झवकंत । कंचण काया झिगमिगे, ऐसी पद्मणी हुँत ॥६॥ रजक तेरि नप-पूछि है, किसके चीर सुचीर । - महाराइ प्रधान तुम, वीरोचन त्रिय चीर ॥७॥ सुनत बात चित्त 'पट लगी, नृप तव भयो अधीर । पाछौ फिर आयौ सुघरि, पिणि मन में दिलगीर ॥८॥ ए पद्मिणि नारि विण, इहु जीवित अप्रमाणवारजेचन त्रिय 'भोगवू, जनम गिणं सुप्रमाण ।।६।' नृप बोलाई "प्रधान तब, कहत वात- सुविचार । "
SR No.010382
Book TitleJinaharsh Granthavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAgarchand Nahta
PublisherSadul Rajasthani Research Institute Bikaner
Publication Year1962
Total Pages607
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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