SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 52
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ( २० ) सकते । और इसी लिए स्यादवाद उपयोगी व सार्थक है । महावीर के सिद्धान्त में बतलाये हुए स्यादवाद को लोग संशयवाद कहते हैं । मगर मैं इस बात को स्वीकार नहीं करता । स्यादवाद संशयवाद नहीं है मगर वह हमें एक दृष्टिबिन्दु देता है । विश्व निरीक्षण के वास्ते हमें पाठ पढाता है । 1 ( 8 ) महात्मा गांधीजी का अभिप्राय. सृष्टिमें परिवर्तन होता है इसी लिए सृष्टि को असत्य अर्थात् अस्तित्व रहित कह सकते हैं, परन्तु ( पर्याय भेदसे ) परिवर्तन होने पर भी उसका कोई एक ऐसा स्वरूप है जिस रुपमें वह है और इसी लिए वह सत्य है । ( वस्तुगत से ) इस लिए अगर उसको सत्यासत्य कहो तो भी मुझे विरोध नहीं है । और इसीसे मुझे अनेकान्तवादी या स्यादुवादी कहने में आवे तो कोई बाध नहीं है । केवल मैं I स्यादूवाद को जिस तरह पहचानता हूँ उसी तरह माननेवाला हूँ । शायद् पंडितवर्ग जिस तरह कहें उस तरह नहीं । अगर वे मेरे साथ वादविवाद करें तो मैं हार जाऊँगा । मैंने अपने अनुभवसे देखा है कि- मैं अपनी नजर में हमेशां सच्चा होता हूँ और मेरे प्रामाणिक टीकाकारों की दृष्टिमें झुंठा होता हूँ । मगर यह जानने से मैं उनसे सहसा झूठे और प्रपंची नहीं मान सकता । सात नेत्रविहीनोंने हाथी को सात तरह से बताया ।
SR No.010319
Book TitleJain Tattvasara Saransh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSurchandra Gani
PublisherJindattasuri Bramhacharyashram
Publication Year
Total Pages249
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy