SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 190
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ( १० ) इन्द्रियोनी मदद विना इच्छित कार्यों करेछे - जिह्वानी मदद विना जाप जपेछे, कर्णनी मदद विना सांभळेछे अने जल पुष्प फल तथा दीप ए द्रव्यो विना सद्भाव पूजाने सफल करेछे तेवी रीते आ जीव पण इन्द्रियो तथा हस्तादि विना ए कालस्वभावादि पंच समवायथी प्रेराइने कर्मोने ग्रहण करेछे.* जो जीवना एक एक प्रदेशमां अनंत कर्मों लागेलां छे तो ते पिण्डीभूत थने दृष्टी देखातां केम नथी ? सूक्ष्मतम कर्मो आपण जेवा चर्मचक्षुवाळाथी जोइ शकातां नथी पण ज्ञानीओ मात्र पोतानी दिव्य ज्ञानदृष्टिना उदयथी तेमने जोइ शकेछे. आना उपर दृष्टांत सांभळो. जेम कोइ पात्र अथवा वस्त्रादिमां लागेलां सुगंधी अथवा दुर्गंधी वस्तुनी गंधनां पुद्गलो नाकथी जाणी शकायछे पण पिण्डीभूत थया छतां नयनादिथी देखी शकात नथी तेम जीवने लागेलां कर्म पण आपणाथी देखातां नथी. मात्र केवलज्ञानी स्वज्ञानना प्रभावे तेमने जोइ जाणी शकेछे. जेम सिद्ध करेला पांराए पान करेलुं सुवर्णादि दृष्टिथी देखातुं नथी पण ज्यारे कोइ सिद्ध योगी पुरुष तेने पारामांथी बहार काढेछे त्यारे तेनी सत्ता ( अस्तित्व ) निश्चिंत थाय छे तेम जीवने लागेलां कर्मोने पण मात्र ज्ञानी जोइ जाणी शकेछे, वीजो कोइ नहि. * ब्रह्मनुं ध्यान धरनारने इन्द्रियादिनी मदद विना ब्रह्मत्वनी प्राप्ति थाय छे. - ब्रह्मवादी.
SR No.010318
Book TitleJain Tattvasara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAtmanandji Jain Sabha Bhavnagar
PublisherAtmanand Jain Sabha
Publication Year
Total Pages249
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy