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________________ ( १० ) ४. रस परित्याग-दूध,दही, घृत, तेल,आदि का त्याग करना ५. काया क्लेश- गोदहादि आमन करना । ६. इन्द्रिय पड़िसलेषणा ७. प्रायश्चित-लगे हुए दोपों की आलोचना कर शुद्ध होने स्यादि प्रायश्चित करना । । । ८. विनय - पूजनीय गुरूजनों के प्रति विनय भाव रखना ९. वैयावच्च-रोगी, तपस्वी, वाल आदि की सुश्रुषा करना। १०. सज्झाय-जिनवाणी का पठन, पाठन आदि करना । ११. ध्यान- स्थिर चित्त बनकर लोक स्वरूप, कर्म स्वरूप, आत्मस्वरूपादि तत्व चिंतन में रत रहना। १२. काउसग्ग (कायोत्सर्ग)-काया का ममत्व छोड़ना । बंध.तत्व के दो भेद-- १-द्रव्य वन्ध २-भाव बन्ध । उत्तर भेद ४ प्रकार के :१. प्रकृति वन्ध-कर्म का जो स्वभाव या परिणाम है उसे प्रकृति बन्ध कहते हैं। २. स्थिति बंध-कमों की स्थिति-स्थिति बंध कहलाता है। ३. अनुभाग वंध-जीव परिणामों की तीव्रता व मंदतादि भावों से तीव्र मंदादि रस बंध को अनुभाग बंधकहते हैं ४. प्रदेश बंध-कर्म पुद्गलों का समूह-प्रदेश बंध कहलाता है। मोक्ष तत्त्व के दो भेदः- १-द्रव्य मोक्ष २-भाव मोक्ष । उत्तर भेद ४ प्रकार के प्रमाण से :१-ज्ञान २-दर्शन ३-चारित्र ४-तप । -:: तीसरा द्वार समाप्तम् :
SR No.010317
Book TitleJain Tattva Shodhak Granth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTikamdasmuni, Madansinh Kummat
PublisherShwetambar Sthanakwasi Jain Swadhyayi Sangh Gulabpura
Publication Year
Total Pages229
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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