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________________ ८३ के कथन के रूप में समथन करते हुए नहीं अघाता और ग्राश्चर्य इसका है कि इसमें वह इन्द्रियप्रत्यक्ष को परमार्थ प्रत्यक्ष मानकर उसको संगत ठहराना चाहता है । श्रागे स० पृ० ९६ में समीक्षक ने "स्वतः सिद्ध" का अर्थ अनादि अनंत किया है और इस श्राधार पर उसने द्रव्यसत् और गुणसत् को स्वतः सिद्ध स्वीकार कर लिया है, इसकी हमें प्रसन्नता - है; किन्तु इसी अर्थ में हमने पर्याय को स्वतः सिद्ध नहीं लिखा है, क्योंकि इसकी सिद्धि स्व और पर दोनों प्रकार से स्वीकार की गई है। हमने तो केवल "उपादान स्व है और अभेद विवक्षा में जो उपादान है वही उपादेय है । इसलिये वह अपने से, अपने में अपने द्वारा चाप कर्ता होकर कर्मरूप से उत्पन्न हुआ इतना ही लिखा है, किन्तु समीक्षक ने इसे स्वीकार करके भी हमने पर्याय को भी स्वतः सिद्ध माना है, ऐसा हम पर आरोप कर रहा है, जबकि हमने अपने कथन में पर्याय को स्वतः सिद्ध अर्थात अनादि श्रनन्त लिखा ही नहीं है । हमारा तो यह कहना है कि प्रत्येक द्रव्य अपने कार्य को अपने स्वभाव परिणाम के कारण स्वयं अर्थात् पर की अपेक्षा किये बिना अपने आप उत्पन्न करता है । उसका अर्थ स्वतः सिद्ध अर्थात अनादि अनन्त नहीं होता । इसे समीक्षक को भली भांति समझ लेना चाहिये । saar अवश्य है कि योग्यता की दृष्टि से प्रत्येक कार्य को ऋजुसूत्रनय से स्वतः सिद्ध माना भी जाय तो उसमें भी कोई आपत्ति नहीं है, क्योंकि प्रत्येक कार्य की योग्यता द्रव्यदृष्टि से अनादि अनन्त होती है तथा पर्यायदृष्टि से सादि-सान्त होती है और इसीलिये श्रागम में उसे स्वतः सिद्ध भी स्वीकार किया गया है । उपादान से कार्य हुआ यह सद्भूत व्यवहार ही है । समीक्षक ने (स० पृ० १७ में ) व्यवहारनय से बाह्य सामग्री को प्रयथार्थ कारण तो मान लिया है तथा इस वात को वह पहले भी (स० पृ० ४ में) स्वीकार कर प्राया है । फिर भी वह उसे श्रयथार्थं कारण मानते हुए भी अन्य द्रव्य के कार्य में उसकी सहायता को भूतार्थ भी मानता जाता है । इस प्रकार उसके कथन में यह जो विसंगति है उसका परिहार ब्रह्मा भी नहीं कर सकता है, हमारी क्या बिसात है ? समाधान के मार्ग पर उसे स्वयं चलना होगा, उसमें हम व्यवहार से निमित्त हो सकते हैं । आगे (स० पृ० ६७ से) समीक्षक ने व्यवहारनय की प्रसद्भूतता के विषय में दोनों पक्षों के दृष्टिकोण में जो भेद की बात लिखी है सो व्यवहारनय यह सामान्यवचन है, उसका एक भेद प्रसद्भुत व्यवहारनय भी है, वह स्वयं ही उसे यहीं स्वीकार कर रहा है । क्रमांक (ग) अन्तर्गत समीक्षक ने जो उपादान कारणभूत वस्तु को शुद्ध द्रव्याथिक निश्चयनय का विपय लिखा है, सो प्रागम ऐसा नहीं है, क्योंकि केवल ऐसा मानना एकान्त हो जायगा । वस्तुत: समर्थ उपादान न केवल द्रव्यरूप होता है और न केवल पर्यायरूप होता है, किन्तु उभयरूप ही होता है । दूसरे शुद्ध निश्चयनय का विषय तो अनुपचरित और प्रभेदरूप होता है, उसे उपादान कहना युक्त नहीं है । क्रमांक (छ) विभाग के अन्तर्गत समीक्षक ने प्रसद्भूत व्यवहारतय के उपचरित और अनुपचरित भेदों का जो खुलासा किया है; वह ठीक नहीं है, क्योंकि आगम के अनुसार एक क्षेत्रावगाह में स्थित जो कर्म और नोकर्म है, वे अनुपचरित असद्द्भूत व्यवहारनय से जीव की संयोगी अवस्था होने
SR No.010316
Book TitleJain Tattva Samiksha ka Samadhan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherTodarmal Granthamala Jaipur
Publication Year
Total Pages253
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size14 MB
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