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________________ जैनसिद्धांतसंग्रह.. .[२२९ निनहाथ दीने साथ लीने, खायाखोया वह गया || धनि साधु शास्त्र अभयदिवैया, त्यांग राग विरोधको ।। विन दान श्रावक साधु दोनों, लहै नाही बोधकों ॥ ८॥ . ॐ ही उत्तमत्यागधर्माङ्गाय अध्ये निर्वपामीति स्वाहा ICE परिग्रह चौविस भेद, त्याग करें मुनिरानजी । तिसनामाव उंछेद, घटती जान घटाइये ॥९॥ उत्तम आकिंचन गुण नानौ । परिग्रहचिंता दुख ही मानौ । फाँस तनकसी तनमें सालै । चाह लंगोटीकी दुख भाले । भाले न समता सुख कभी नर विना मुनिमुद्रा धेरै । पनि नगनपर तन-नगन ठाड़े, सुर असुर पायन पैरें । घरमाहि तिसना जो घंटों, रुचि नहीं संसारसौ। बहु धन बुरांहू मला कहिये, लीन पर उपगारसौ ॥९॥ ___ही उत्तमाकिंचन्यधर्माङ्गाय अयं निर्वपामिति स्वाहा ॥९॥ शीलवाड़ि नौ राख, ब्रह्मभाव अन्तर लखो। करि दोनों अभिलाख, करहु सफल नरभव सदा ॥१०॥ उत्तम ब्रह्मचर्य मन आनो । माता बहिन सुता पहिचानो । सहैं वानवर्षा बहु सूरै। टिके न नैन वान लखि कूरे ॥ . कूरे त्रियाके अशुचितनमें, कामरोगी रति करें। बहु मृतक सहहिं, मसानमांहीं, काक ज्यों चौंचे भरें । संसारमें विषवेल नारी, तजि गये जोगीश्वरा । 'धानत' धरमदड़ि चड़िय, शिवमहलमें पग घरा ॥१०॥ ॐ हीं उत्तमब्रह्मचर्यधर्मागाय मध्य निर्वपामिति स्वाहा ॥१०
SR No.010309
Book TitleJain Siddhanta Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSadbodh Ratnakar Karyalaya Sagar
PublisherSadbodh Ratnakar Karyalaya Sagar
Publication Year
Total Pages422
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size12 MB
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