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________________ ३० : जैनसाहित्यका इतिहास तरह रोष शलाका पुरुषोंके सम्बन्धमें भी आवश्यक बातें बतलाई हैं। गा० १३०४-१४१० में चक्रवत्तियोंकी दिग् विजय तथा विभूतिका वर्णन पठनीय है । ____ अन्तिम तीर्थंकर भगवान महावीरकी गणना भारतके ऐतिहासिक महापुरुषोंमें की जाती है। भगवान महावीरके पश्चात् ६८३ वर्ष तक हुए उनके शिष्य प्रशिष्योंकी काल गणना दी गई है। यही काल गणना धवला, जयधवला, हरिवंश पुराण, श्रुतावतार आदि ग्रंथों में तथा पट्टावलियोंमें मिलती है । __ उसके पश्चात् ग्रन्थकारने वीर निर्वाणके पश्चात् शक राजाकी उत्पत्ति होनेका काल देते हुए अनेक मतोंका निर्देश किया है, जो इस बातका सूचक है कि प्राचीन समयमें भी काल गणनामें आश्चर्यजनक मतभेद पाया जाता था। वीर जिनेन्द्रके निर्वाणके पश्चात् चार सौ इकसठ वर्ष बीतने पर शक राजा हुआ । अथवा नौ हजार सात सौ पिचासी वर्ष और पांच मास बीतने पर शक राजा हुआ, अथवा चौदह हजार सात सौ तिरानवे वर्ष बीतने पर शक राजा हुआ। अथवा ६०५ वर्ष ५ मास बीतने पर शक राजा हुआ। ( ४।१४९६-९९ )। इनमेंसे ग्रन्थकारको प्रथम मत मान्य है। किन्तु धवलाकार, हरिवंश पुराण कार (६०५४९ ) और त्रिलोकसारके ( गा० ८५० ) कर्ताको अन्तिम मत मान्य था। वर्तमानमें जो वीरनिर्वाण सम्वत् तथा शालिवाहन शक सम्वत् प्रचलित है उन दोनोंमें ६०५ वर्ष ५ मासका ही अन्तर है। ग्रन्थकार ने वीर निर्वाण के पश्चात् १००० वर्ष में भारत में हुए प्रमुख राजवंशों की काल गणना भी दी है जो ऐतिहासिक दृष्टि से अपना विशेष महत्त्व रखती है। सबसे प्रथम ग्रन्थकार ने इस काल गणना के सम्बन्ध में एक मतान्तर दिया है जिसके अनुसार श्रीवीर भगवान के निर्वाण काल के पश्चात् ४६१ वर्ष बीतने पर शक नरेन्द्र हुआ। उसके वंश का राज्य काल २४२ वर्ष तक रहा । फिर २५५ वर्ष तक गुप्तों का राज्य रहा। फिर ४२ वर्ष तक चतुर्मुख कल्किका राज्य रहा। इस तरह ४६१ + २५५ + २४२ + ४२ = १००० वर्ष होते हैं । । (४।१५०३-४) । ___ इसके बाद की राज्य काल गणना उल्लेखनीय है। जिस समय भगवान हावीर का निर्वाण हुआ उसी समय अवन्तिसुत पालकका राज्याभिषेक आ। साठ वर्ष तक पालक का, एक सौ पचपन वर्ष तक विजय वंशियों का, लीस वर्ष मुरुण्ड' वंशियों का, और तीस वर्ष पुष्यमित्र का राज्य रहा। . तपागच्छ पट्टावली, तीर्थोद्धार प्रकरण और मेरुतुंग की विचारश्रेणी में पालक के बाद १५५ वर्ष राज्यकाल नन्द राजाओं का लिखा है। • प्रभावक चरित में पाटली पुत्र के मुरुण्ड राज्यवंश का वर्णन है ।
SR No.010295
Book TitleJain Sahitya ka Itihas 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKailashchandra Shastri
PublisherGaneshprasad Varni Digambar Jain Sansthan
Publication Year
Total Pages411
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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