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________________ हनुमानका सीताकी खबर लाना । २६७ ፡፡ रे विश्वासघातक ! बता मेरा पुत्र शंबूक कहाँ है मेरे पुत्रको मारनेकी हत्याका अपराध कर, क्या तू इस तुच्छ विराधकी सहायता से रक्षित होना चाहता है ? " लक्ष्मणने हँसकर उत्तर दियाः - " तेरा बन्धु त्रिशिरा अपने भतीजे को देखने के लिए उत्सुक हो रहा था, इस लिए मैंने उसको तेरे पुत्र के पास पहुँचा दिया है । अब यदि तू भी अपने अनुजको और पुत्रको देखनेके लिए बहुत उत्कंठित हो रहा हो, तो तुझको भी उनके पास पहुँचाने के लिए मैं धनुष सहित तैयार हूँ । रे मूढ ! पैरोंके नीचे आकर जैसे कुंथुआ मर जाता है, वैसे ही, प्रमाद वश मेरे क्रीडा - प्रहारसे तेरा पुत्र मरगया । उसमें मेरा कुछ पराक्रम नहीं था; परन्तु अपने आपको सुभट समझने वाला तू यदि मेरे रणकौतुकको पूर्ण करेगा, तो वनवासमें भी मैं दान देनेवाला होऊँगा; यमराजको प्रसन्न करूँगा । "" लक्ष्मणके ऐसे वचन सुनकर, खर उनके ऊपर तीक्षण प्रहार करने लगा; जैसे गिरि शिखरपर हाथी प्रहार करता है । लक्ष्मणने भी हजारों कंकपत्रोंसे- कंकपक्षीके परोंवालेतीरों से- आकाश मंडलको आच्छादित कर दिया; जैसे कि सूर्य अपनी किरणोंसे आकाशको पूरित कर देता है ।
SR No.010289
Book TitleJain Ramayana
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKrushnalal Varma
PublisherGranthbhandar Mumbai
Publication Year
Total Pages504
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size31 MB
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