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________________ किल्विप-पाप , अन्त्यजो के ममान हीन देव । काष्ठ-संस्तर-साधु के सोने के लिए लकडी का पाटा। कीलिका-संहनन-शरीर सहनन विशेष , हड्डियो के बीच मात्र कील का होना। कुक्षि-अडतालीम अगुल का एक क्षेत्र प्रमाण । कुगुरु-कुशास्त्र प्रशसक, दूषित गुरु । कुडव-बारह अजुलि , एक सेर । कुतीर्थ-दूषित दर्शन, दूषित मत का अनुयायी। कुदर्शन-मिथ्या सिद्धान्त । कुदृष्टि-दूषित दृष्टि । कुदेव-मिथ्यात्व के प्रवर्तक । कुधर्म-मिथ्यामत का पोषण । कुशास्त्र-असर्वज्ञ प्रणीत मिद्धान्त । कुम्भक-प्राण-वायु/श्वास को नाभि कमल में रोकना । कुल-१ जातिभेद ; जीवो की १६१३ लाख करोड जातिया ; २ शिष्य समुदाय । कुलकर-आदि युग के प्रारम्भ में नीति आदि का प्रवर्तक महापुरुष । कुशील-१ अब्रह्मचर्य, २ अनाचार पूर्वक जीवन-यापन । [ ३८ ]
SR No.010280
Book TitleJain Paribhashika Shabdakosha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorChandraprabhsagar
PublisherPrakrit Bharti Academy
Publication Year
Total Pages149
LanguageHindi
ClassificationDictionary
File Size3 MB
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