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________________ २२] जन पूजांजलि __दर्शनीय श्रवणीय आत्मा, वंदनीय मननीय महान । शान्ति सिन्धु सुख सागर अनुपम, नव तत्वों में श्रेष्ठ प्रधान ॥ इस प्रकार इस भरत क्षेत्र के जीवों पर अनन्त उपकार । हे सीमन्धर नाथ आपके, करो देव मेरा उद्धार । समकित ज्योति जगे अन्तर में हो जाऊँ मैं आप समान । पूर्ण करो मेरी अभिलाषा हे प्रभु सीमन्धर भगवान ॥ ॐ ह्री श्री सोमन्धर जिनेन्द्राय पूणाय॑म् निर्वपामीति स्वाहा । सीमन्धर प्रभु के चरण भाव सहित उरधार । मन वच तन जो पूजते वे होते भवपार ।। x इत्याशीर्वादः ४ जाप्य- ॐ ह्रीं श्री सीमन्धर नाथ जिनेन्द्राय नमः श्री कृत्रिम अकृत्रिम चैत्यालय पूजन तीन लोक के कृत्रिम प्रकृत्रिम जिन चैत्यालय को वंदन । ऊर्ध्व मध्य पाताल लोक के जिन भवनों को करूं नमन ॥ हैं अकृत्रिम पाठ कोटि अरु छप्पन लाख परम पावन । संतानवें सहस्र चार सौ इक्यासी गृह मन भावन ॥ कृत्रिम प्रकृत्रिम जो असंख्य चैत्यालय हैं उनको वंदन । विनय भाव से भक्तिपूर्वक नित्य करू मैं जिन पूजन ॥ ॐ ह्रीं तीन लोक संबंधी कृत्रिम अकृत्रिम जिन चैत्यालयस्थ जिन बिम्ब समूह अत्र अवतर अवतर संवौषट् । ॐ ह्रीं तीन लोंक संबंधी कृत्रिम अकृत्रिम जिन चैत्यालस्थ जिन बिम्ब समूह अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः। ॐ ह्रीं तीन लोकसंबंधी कृत्रिम अकृत्रिम जिन चैत्यालस्थ जिन बिम्ब समूह अत्र मम् सन्निहितो भव भव वषट् ।
SR No.010274
Book TitleJain Pujanjali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRajmal Pavaiya Kavivar
PublisherDigambar Jain Mumukshu Mandal
Publication Year
Total Pages223
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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