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________________ मंगल। इनमें तीर्थकर प्रभू, और भक्ति वर वीर । वात माव जिनदेवके, चौबीसा चौबीस । नौ नारद चौदा मन्, कामदेव चौबीस ॥ एकादश रुद्रा महा, इत्यादिक पद धारि । उपजे चौथे काल ही, ए निश्चे उर धार ॥२०॥ या विध भये अनन्त जिन, होसी देव अनंत । सबको मारग एक ही, ज्ञान क्रिया बुधिवंत ।। सबही शान्ति प्रदायका सब ही केवल रूप। सवही धर्म निरूपका, हिंसा-रहित सरूप ।। सबही आगम भासका, सब अध्यातम मूल । मुक्ति-मुक्ति-दायक सवै, ज्ञायक सूक्ष्म थूल ॥ बरननमें आवें नहीं, तीन कालके नाथ । सर्व क्षत्रक जिनवरा, नमो जोरि युग हाथ ॥ भरतक्षेत्र यह आपनो, जम्बूदीप मझारि । ताके मैं चौबीमिका, बन्दु श्रुति अनुसारि ॥ निर्वाणादि भये प्रभू निर्वाणी चौबीस । तेअतीत जिन जानिये, नमो नाय निजशीश ॥ जिन भाष्यौद्व बिधि धरम, परमधामकोमूल ! यति श्रावकके भेद करि, इक सुक्ष्म इकथूल । बहुरि वर्तमाना जिना, रिषभादिक चौबीस । नमों तिनें निजभाव करि जिनके रागनरीस ॥ तिनहू सोही भाषियौ, द्वै विधि धर्म विलास । महानत मणुननमय, जीवदया प्रतिपाल ।
SR No.010271
Book TitleJain Kriya Kosh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDaulatram Pandit
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages225
LanguageHindi
ClassificationDictionary
File Size7 MB
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