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________________ ४ तप की महिमा जैनेतर ग्रन्थों में तप तेज है ससार मे वही जीवन श्रेष्ठ होता है जो तेजस्वी होता है, प्रभावशाली, ओजस्वी और ज्योतिर्मय होता है । तेजोहीन, ज्योतिहीन निष्प्रभ जीवन निष्प्राण शरीर के समान है । आपको जानना चाहिए कि जीवन मे 'तेजस्' ही मुख्य तत्त्व है । इसी तेजस् तत्व को 'तप' कहा जाता है। वैदिक सहिताओ मे प्रायः तपस् के स्थान पर व तपस् के अर्थ मे 'तेजस् शब्द का ही प्रयोग किया गया है । तेजस्वी बनने के लिए 'तपस्' की साधना का उपदेश किया गया है । तप रहित जीवन मिट्टी का वह दीपक है, जिसके पास आकार तो है, किन्तु ज्योति नही है, क्या ऐसे ज्योतिहीन हजार लाख दीपको से भी कुछ बनने वाला है ? "दीव सयसहस्त कोडीवि ?' उन करोडों दीपको से भी क्या लाभ है, जिनमे ज्योति नहीं है । १. आवश्यक निर्युक्ति
SR No.010231
Book TitleJain Dharm me Tap Swarup aur Vishleshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMishrimalmuni, Shreechand Surana
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year1972
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size23 MB
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