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________________ ईश्वर को 'साविशेष ब्रह्म' भी कहा जाता है। अद्वैत वेदान्त में ईश्वर को 'मायोपहित ब्रह्म' माना गया है अर्थात् जब ब्रह्म का प्रतिबिम्ब माया में पड़ता है तब वह ईश्वर का रुप धारण कर लेता है और ईश्वर अपनी माया शक्ति से ही इस प्रपञ्च रूपी जगत की सृष्टि करता है। ईश्वर व्यक्तित्वपूर्ण है, कारण रहित है, उपासना का विषय है ईश्वर की सत्यता उसी समय तक है जब तक जीव का अज्ञान है। अद्वैत वेदान्त में ईश्वर को जगत का उपादान तथा निमित्त कारण दोनों माना गया है। सृष्टि ईश्वर का स्वाभाविक गुण है और इस सृष्टि के पीछे ईश्वर का कोई प्रयोजन या उद्देश्य नहीं होता। ईश्वर की तीन अवस्थाओं का वर्णन क्रमशः ईश्वर, हिरण्यगर्भ तथा वैश्वानर नाम से किय गये हैं। माया की क्रिया प्रारम्भ होने से पहले ईश्वर होता है किन्तु माया की सक्रियता की स्थिति हिरण्यगर्भ की होती है और जब स्थूल पदार्थों की रचना करता है, तब ईश्वर से पूर्ण रूप से विकसित अवस्था को वैश्वानर' या 'विराट' भी कहा जाता __ ईश्वर और जीव की सत्ता व्यवहारिक है ईश्वर शासक है जीव शासित है। ईश्वर ही जीव को उसके अच्छे-बुरे कर्मों का फल देता है। जीव भोक्ता है ईश्वर इससे परे है। आत्मा और ब्रह्म में कोई अन्तर नहीं है दोनों अभिन्न है जब इस तत्त्व को आत्मनिष्ठ दृष्टि से देखा जाता है तब इसे आत्मा कहा जाता है और जब वस्तुनिष्ठ दृष्टि से देखा जाता है तब वह 'ब्रह्म' कहा जाता है। अज्ञानता के कारण ही जीव अर्थात् आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान नहीं पाता है। 'तत्वमसि' आत्मा तथा ब्रह्म की एकता को प्रतिपादित करता है। जब 'तत्त्वमसि' वाक्य की परिणति 'अहं ब्रह्मास्मि' महावाक्य में हो जाती है तब उसे ब्रह्मज्ञान की अनुभूति होती है। बन्धन और मोक्ष आचार्य शङ्कर ने स्पष्ट करते हुये कहा है कि बन्धन और मोक्ष की कोई वास्तविक सत्ता नहीं होती है। इसकी केवल व्यवहारिक सत्ता है। आत्मा का शरीर एवं 120
SR No.010176
Book TitleBramhasutra me Uddhrut Acharya aur Unke Mantavyo ka Adhyayan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVandanadevi
PublisherIlahabad University
Publication Year2003
Total Pages388
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size33 MB
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