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________________ खण्ड ] ● मुमुक्षुओंके लिये उपयोगी उपदेश * श्राप देने से एक वर्षका तप नष्ट होता है और हिंसाकी ओर अप्रसर होनेसे समस्त तप नष्ट होजाता है । २११ (१३) जो मनुष्य क्षमारूपी खड्गसे क्रोधरूपी शत्रुका नाश करता है, उसीको सात्त्विक, विद्वान्, तपस्वी और जितेन्द्रिय समझना चाहिये । ( १४ ) इस संसार में जीव कर्मके ही कारण सुख-दुःख भोगा करता है । इसलिये सुखार्थी जीवोंको शुभ कर्मका संचय करना चाहिये। साथ ही चेतन स्वरूप आत्माको सुज्ञानके साथ जोड़कर अज्ञानसे उसको बचाना चाहिये । (१५) मनुष्य बुद्धि, गुण, विद्या, लक्ष्मी, बल, पराक्रम, भक्ति किंवा किसी भी उपाय से अपनी आत्माको मृत्यु से बचा नहीं सकता । कहा भी है कि जिस प्रकार अपने पतिकी पुत्र-वत्सलता देखकर दुराचारिणी स्त्री हॅमती है; उसी तरह शरीर की रक्षा करते देखकर मृत्यु और धनकी रक्षा करते देखकर वसुन्धरा मनुष्य को हँसती है। देव असम्भव को संभव और संभवको असम्भव बनाता है । कभी-कभी वह ऐसी बातें कर दिखाता है, जिसकी मनुष्य कल्पना भी नहीं कर सकता । भवितव्यता प्राणियों के साथ उसी तरह लगी रहती है, जिस प्रकार शरीरके साथ छाया । उसे पृथक् करना - उसके प्रभाव से बचना कठिन ही नहीं, बल्कि असम्भव है । यह जीव अशरण है । प्राणियोंपर बार-बार जन्म-मरणकी जो विपत्ति पड़ती है, उसे दूर करना किसीके
SR No.010089
Book TitleJail me Mera Jainabhayasa
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages475
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size28 MB
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