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________________ १४० जैनशासन प्रेम अथवा मैत्री किया जाता है। इसको चीनी भापामे जैन (Jen), कहते है। निषेधात्मक अहिंसाको 'पु है' '( Pu-HAI ) कहते है । अहिंसा जैनधर्म और जैन जीवनका प्राण है। उसका पर्यायवाची शब्द चीनी भाषामे 'जन' या 'जिन' होना भाषाशास्त्रियोके लिए विशेष चिन्तनीय प्रतीत होता है । करुणासे जैन धर्मका सम्बन्ध देखकर निष्पक्ष विद्वान् जहा भी विमल प्रेमकी गगा या उसकी शाखाको देखते हैं, वहा वे जैन प्रभाव को उद्घोषित किए विना नही रहते है। ईसाके तीन चार सदी पूर्व तक्षशिलामे आयुर्वेदका शिक्षण उच्चकोटि था। वहा पशुओकी श्रेष्ठ चिकित्सा का भी प्रबन्ध था। इसका कारण प० जवाहरलाल नेहरू जैनधर्म और बौद्धधर्मका प्रभाव बताते है, जो अहिंसापर अधिक जोर देते है। अहिसा की विचारधाराको एक विशिष्ट मर्यादाके भीतर प्रचारित करनेवाले गाधीजी पर, वैष्णव परिवारमे जन्म धारण करते हुए भी, जैनधर्मका विशेप प्रभाव था, कारण वे अपनी माताके प्रभावमे थे और उनकी मातापर जैन' साधुका विशेष प्रभाव था, यह बात उनकी जीवनगाथापर प्रकाश डालनेवाले विदेशी लेखकोने विशेष रूपसे प्रकट की है। जार्ज केटलिन तो गुजरात प्रान्त मात्रको जैनधर्मके प्रभावापन्न मानता हुआ उस वातावरण से गाधीजीके जीवनको अनुप्राणित-सा अनुभव करता है। बाह्य वातावरणका जीवनपर गहरा असर होता ही है। अहिंसाके उच्च समाराधक 1 "In the third or fourth century BC there were also hospitals for animals This was probably due to the influence of Jainism and Buddhism with their emphasis on non-violence" Discovery of India p 129 २ "M K Gandhi's mother was under Jain influenceAlthough his mother was a Vaishnava Hindu she came much under the influenze of a Jain monk after her husband's death "_“In the Path of Mahatma Gandhi" p. 202-by George Catlion,
SR No.010053
Book TitleJain Shasan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSumeruchand Diwakar Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1950
Total Pages517
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size20 MB
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