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________________ १०२ जैन साहित्य संशोधक [ भाग. एक दाखलो आपीशं. पांचमां पानामां नीचे प्रमाणे तेथी ए विषयना अभ्यासीने सहेलाईथी अर्थज्ञान सत्र छे. थई शके तेम छे. 'उध्दृताश्चक्रिहरियुगाहज्जिनयतिदेश- आह प्रसंगथी एक जरा कडवी पण हितकर सम्यक्त्ववन्तः । वात सूचववानुं मन थई आवे छे के- सागरानंद___ आ सूत्रनी रचनामां जे खामी छे तेनो तो अमे अ. सूरि जेवा विद्वान् अने प्रतिभाशाली मुनिए आजना हिं निर्देश ज करवा इच्छता नथी. भाषान्तरनाविष जमानामां आवा अनावश्यक अने अनुपयोगी का. यमा ज अमारे थोडंक कहेवं छे. आ सूत्रनो शब्दा - मोमां काळक्षेप.करवो उचित नथी. समय घणो र्थ अने विशेषार्थ नीचे प्रमाणे करवामां आव्यो छे. - बदलाई गयो छ. सर्वसाधारणनी आभिरुचि कोई जुदा ज विषयोना अभ्यास तरफ वधती जाय छे. 'शब्दार्थ-अनुक्रमे पहेली नारकी आदीथी विद्वानोना अध्ययन-मनन- साहित्य क्षेत्र भिन्नज नकळेला चक्रवर्ती, बलदेव अने वासुदेव, आरहंत प्रकार थई रह्य छे. नवीन वातावरणमां उछरती केवली, सर्वविरति, देशविरति अने सम्यक्त्व अने केळवणी पामती प्रजानो आवी जातना लूखा, वाला थाय छे. नीरस, अनुपयुक्त, जूना विषयो तरफ आभिरुचि वि०-पहेली नारकीथी नीकलेलो चक्रवर्ती वधे के श्रद्धा बसे तेम बिल्कल नथी. वर्तमान थाय. बीजी नारकीथी नीकळेलो जीव वासुदेव समयमा प्रत्यक्ष प्रमाणथी निश्चित थपला खगोल अथवा बलदेव थाय. त्रीजी वालुका प्रभाथी नीक- अने भूगोलना सिद्धान्तो आगळ जगत्ना रेक ळेलो जीव तीर्थकर थाय.' इत्यादि. धर्मना ए विषयना जूना विचारो निस्तेज अने ___ आ शब्दार्थ अने विशेषार्थनी वाक्यरचनाथी अर्थहीन साबित थया छ, अने प्रत्येक धर्मना बहुतो वचकने एवोज अर्थावबोध थाय के पहेली श्रुत विद्वान् ते विचारोने अधिकांश कल्पना-प्रसूत नरकमांथी निकळेलो प्राणी चक्रवर्तीज थाय, बी- माने छ.। जीमाथी निकळेलो बासदेव अगर बलदेवज थाय. तत्त्वार्थसूत्र में जाते कॉलेजियनो तेमज ग्रेज्युएटत्रीजीमांथी निकळेलो तीर्थकर ज थाय. इत्यादि। डबलग्रेज्युएट जेवा उच्च शिक्षण पामेला अनेक परंतु यथार्थमा परिशिष्टकारनो खुदनो कहेवानो जैन-अजैन अभ्यासियोने तुलनात्मक पद्धतिए भावार्थ एम नहि हशे. कारण के तेम होय तो ते पण शीखव्युं अगर वंचायुं छे तेमां आवतो तद्दन असंगत गणाय. आ विषयमा शास्त्रकारोनो खगोल-भूगोल विषयक भाग केवळ विनोदनी अभिप्राय तो एवो छ के नरकमाथी निकळेलो खातर समजावतां पण मने घणो संकोच थतो जीव जो चक्रवर्ती पद प्राप्त करवाने योग्य होय तो हतो अने शीखनार तेवा एके एक सूत्र उपर सादते फक्त पहेली नरकमांथी ज निकळेलो होय छे. र उपहास व्यक्त करता हता. जो के हुँ केटलेक वासुदेव अगर बलदेव पदनी प्राप्ति पहेली अन बी- अंशे तेनुं समाधान अमुक पद्धतिए करी शकतो. जी एम बन्ने नरकमांथी निकळेला जीवोमे होई परंतु यथार्थ समर्थन तो माराथी कोई पण प्रमाशके छे अने तेवीज रीते तीर्थकर पदनी प्राप्ति पहे- णथी न ज थई शकतुं. मने घणाक विद्वानोए तो ली, बीजी अने त्रीजी नरकसुधीमांथी निकळेला आवी खास सूचनाओ करी छे के तत्त्वार्थसूत्रमाथी प्राणियोने थई शके छे. इत्यादि. आवी रीते बीजां आ विषयने लगतो विभाग काढी नांखी तेने पण घणां स्थले अर्थ-करणमां भूलो थयेली नजरे संक्षिप्त बनाववानी अवश्यकता छे के जेथी नवीपडे छे. आशा छे के पीजी आवृत्तिमां न शिक्षितोने आविषयनी गंध सुधां न आवे अने आ संबंधमां उचित लक्ष्य आपवामां आवशे. बाकी तेथी तेमना मनमा, आपणा पूर्वाचार्योनी बीजी एकंदर रीते परिशिष्टमा ए विषयनो सारो संग्रह अननपमेय कृतियोनी प्रामाणिकताना संबंधमां अने साथे जे आकृतियो विगेरे आपी के कोई पण प्रकारना कतो किंवा सन्दहो उत्पन्न Aho I Shrutgyanam
SR No.009877
Book TitleJain Sahitya Sanshodhak Khand 01 Ank 01 to 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinvijay
PublisherJain Sahitya Sanshodhak Samaj Puna
Publication Year1922
Total Pages274
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size23 MB
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