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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir प्रवचन-२४ ३२४ दूसरों के प्रति धिक्कार? एक भिखारी दूसरे भिखारी को कहे कि : 'तुझे शर्म नहीं आती भीख माँगते हुए? मेहनत कर... भीख मांगना अच्छा नहीं।' तो? आपके हृदय में पापों के प्रति अरूचि पैदा हुई है? पापों के प्रति नफरत हो गई है क्या? पाप करने से पहले दुःख होता है? 'मुझे इस मानवजीवन में पाप करना पड़ेगा? कैसा मेरा दुर्भाग्य?' होता है ऐसा अफसोस? पाप करने के पश्चात् पश्चात्ताप होता है क्या? मान लो कि पाप करते समय सुख अनुभव करते हो, परन्तु पाप हो जाने के पश्चात् दुःख होता है? मेरा चले तो मैं भविष्य में ऐसा पाप नहीं करूँ।' ऐसे विचार आते हैं नहीं! आप पाप करो, आपको मज़ा आता है, दूसरा पाप करे इससे आपको घृणा होती है - सही बात है न? यह आपकी पाप के प्रति घृणा नहीं है, जीव के प्रति है। पाप करनेवाले जीवों के प्रति भी करुणा होनी चाहिए। श्रमण भगवान महावीरदेव ने पापी जीवों के प्रति भी करुणा का स्रोत बहाया था। अनेक महापुरुषों ने इस करुणापथ पर चलकर भव्य उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। यदि हम उनके पद-चिह्नों पर चलें तो हमको भी महानता प्राप्त हो सकती है। अपनी आत्मा महात्मा बन सकती है | महात्मा बनना है न? महात्मा यानी साधु बनने की बात नहीं करता हूँ, हृदय को उदात्त बनाने की बात करता हूँ | अपना हृदय महात्मा का हृदय बन जाना चाहिए। आपका आदर्श बन जाए कि 'मुझे महात्मा बनना है, तो ही इस दिशा में गति हो सकती है। यदि अधमात्मा ही बने रहना है, शत्रुता, तिरस्कार और क्रूरता को बनाये रखनी है, तो इन बातों से आपका कोई संबंध नहीं रहता। परन्तु आप यहाँ मेरे पास आते हो, प्रतिदिन आते हो, प्रेम से मेरी बातें सुनते हो, इसलिए मैं मानता हूँ कि आपको महात्मा बनना पसन्द तो है! सही बात है न? प्रमोद-भावना : _ 'गुणीषु प्रमोदः' गुणवानों के प्रति प्रमोद-भावना चाहिए। प्रमोद यानी प्रेम! गुणवानों के प्रति प्रेम! गुणों के प्रति प्रेम होगा तो गुणवानों के प्रति प्रेम होगा। परन्तु एक बात पूछ लूँ आप से। क्या आपको इस संसार में कोई मनुष्य गुणवान दिखता है? सर्वगुणसंपन्न परमात्मा तो अभी सदेह है नहीं। अभी तो अपनी दुनिया में जो जीव हैं वे सभी गुण और दोष, दोनों से युक्त ही होंगे। हाँ, ऐसा कोई जीव संसार में नहीं है कि जो दोषों से परिपूर्ण हो और गुण एक भी न हो। प्रत्येक जीवात्मा में कोई न कोई गुण होता ही है। अपने पास गुणदृष्टि होनी चाहिए। गुणदृष्टिवाला मनुष्य ही दूसरों में गुणदर्शन कर सकता है और गुणों से प्रेम कर सकता है। जो दोषदृष्टिवाले हैं, वे गुणों से For Private And Personal Use Only
SR No.009629
Book TitleDhammam Sarnam Pavajjami Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBhadraguptasuri
PublisherMahavir Jain Aradhana Kendra Koba
Publication Year2010
Total Pages339
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, & Religion
File Size2 MB
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