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________________ माता-पिता और बच्चों का व्यवहार माता-पिता और बच्चों का व्यवहार वह एक अक्षर भी नहीं बोल पाए। वह शील का प्रभाव है! अगर हम एक अक्षर भी सामने बोलने की तैयारी करें न, तो शील टूट जाएँ। इसलिए तैयारी नहीं करनी। जिसे जो कहना हो कहे। 'सर्वत्र मैं ही हूँ' कहना। (आत्मस्वरूप से सबके साथ अभेद हूँ।) प्रपंच के सामने तैयारी करने में हमें नये प्रपंच खड़े करने पड़ते हैं और फिर हम स्लिप (फिसल) हो जाते हैं। अब हमारे पास वह शस्त्र ही नहीं है न! उसके पास तो वह शस्त्र है, इसलिए वह भले ही चलाए! किन्तु वह 'व्यवस्थित' है न! इसलिए आखिर उसका शस्त्र उसे ही लगता है, ऐसा 'व्यवस्थित' है! उसे सभी समझ अंदर फिट हो गई। दादाजी ने ड्रॉईंग कर दिया। मुझसे बोली, 'ऐसा ड्रॉईंग कहना चाहते हो?' मैंने कहा, 'हाँ, ऐसा ड्रॉईंग।' कहना पडे! फिर लडकी ने उसके माता-पिता से बात कही। उसकी बात सुनकर उसके पिता जो डॉक्टर थे, वे दर्शन करने आएँ। देखो, ऐसे दादाजी को कुछ देर लगती है? मशरूर आनी चाहिए यहाँ! आ गई तो ऑपरेशन हो गया झट-पट! देखो, वहाँ पर कायम 'दादाजी, दादाजी' हर रोज याद करती है न! सबके काम हो जाएँ। हमारा एक-एक शब्द तुरंत समाधान लानेवाला है। वह आखिर मोक्ष तक ले जाता है ! आप सिर्फ 'एडजस्ट एवरीव्हेर' किया करो। १९. संसार में सुख की साधना, सेवा से जो मनुष्य माता-पिता के दोष देखता है, उसमें कभी भी बरक़त नहीं होती। संभव है पैसेवाला हो, पर उसकी आध्यात्मिक उन्नति कभी भी नहीं होती। माता-पिता के दोष नहीं देखने चाहिए। उनका उपकार तो भूल ही कैसे सकते हैं? किसी ने चाय पिलायी हो तो भी उसका उपकार नहीं भूलते, तो फिर हम माता-पिता का उपकार तो कैसे भुला सकते हैं? तू समझ गया? हाँ, अर्थात् तुझे उनका उपकार मानना चाहिए, मातापिता की बहुत सेवा करनी चाहिए। वे उल्टा-सीधा कहें तो हमें ध्यान पर नहीं लेना चाहिए। वे उल्टा-सीधा कहें मगर वे बड़े हैं न! क्या तुझे भी उल्टा-सीधा बोलना चाहिए? प्रश्नकर्ता : नहीं बोलना चाहिए। पर बोल देते हैं उसका क्या? मिस्टेक (गलती) हो जाए तो क्या? दादाश्री : हाँ, क्यों फिसल नहीं जाता? क्योंकि वहाँ जागृत रहता है और अगर फिसल गया तो पिताजी भी समझ जायेंगे कि यह बेचारा फिसल गया। यह तो जान-बूझकर तू ऐसा करने जाए तो, 'त् यहाँ क्यों फिसल गया?' उसका मैं जवाब माँगें। सही है या गलत? संभव हो वहाँ तक हमसे ऐसा नहीं होना चाहिए, फिर भी तुझसे ऐसा कुछ हो गया होगा तब सभी समझ जाएँगे कि यह ऐसा नहीं कर सकता। माता-पिता को खुश रखना। वे तुझे खुश रखने के प्रयत्न करते हैं कि नहीं? क्या उन्हें तुझे खुश रखने की इच्छा नहीं है? प्रश्नकर्ता : हाँ, किन्तु दादाजी, हमें ऐसा लगता है कि उन्हें किचकिच करने की आदत हो गई है। दादाश्री : हाँ, लेकिन उसमें तेरी भूल है, इसलिए माता-पिता को जो दुःख हुआ, उसका प्रतिक्रमण करना चाहिए। उन्हें दुःख नहीं होना चाहिए, 'मैं सुख देने आई हूँ' ऐसा तुम्हारे मन में होना चाहिए। मेरी ऐसी क्या भूल हुई की माता-पिता को दुःख हुआ ऐसा लगना चाहिए। पिताजी बरे नहीं लगते? ऐसे लगेंगे तब क्या करेगी? सच में बुरे जैसा इस दुनिया में कुछ है ही नहीं। हमें मिलीं वे सभी अच्छी चीजें होती हैं। क्योंकि हमारे प्रारब्ध से मिली हैं। माँ मिली, वह भी अच्छी। कैसी भी काली-कलूटी हो, फिर भी हमारी माँ ही अच्छी। क्योंकि हमें प्रारब्ध से जो मिली वह अच्छी। क्या बदल कर दूसरी ला सकते हैं? प्रश्नकर्ता : नहीं।
SR No.009593
Book TitleMata Pita Aur Bachho Ka Vyvahaar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDada Bhagwan
PublisherMahavideh Foundation
Publication Year2009
Total Pages61
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Akram Vigyan
File Size38 KB
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