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________________ निश्चयनय अध्यात्म के नय उक्त उदाहरणों में व्यवहारनय पर से एकत्व स्थापित कर रहा है और निश्चयनय उससे स्पष्ट इंकार कर पर से भेद कर रहा है। अथवा ज्ञानी (आत्मा) के चारित्र, दर्शन, ज्ञान - ये तीन भेद व्यवहार से कहे जाते हैं, निश्चय से ज्ञान भी नहीं है, चारित्र भी नहीं है, दर्शन भी नहीं है; ज्ञानी तो एक शुद्धज्ञायक ही है। - इस उदाहरण में व्यवहारनय स्व में भेद कर रहा है और निश्चयनय उससे इंकार कर स्व में अभेद स्थापित कर रहा है। इसप्रकार व्यवहार का कार्य निज में भेद और पर से अभेद करके समझाना है और निश्चय का कार्य पर से भेद और स्व से अभेद करना है। व्यवहारनय दो द्रव्यों में कर्ता-कर्म का भेद करता है, उनमें कर्ताकर्म का संबंध बताता है और निश्चयनय अभिन्न षट्कारक के साथसाथ कर्ता-कर्म के भेद का निषेध करता है। यही इनके परस्पर विरोध का रूप है। निश्चयनय और व्यवहारनय के कथनों में जो परस्पर विरोध दिखाई देता है, वह विषयगत है; क्योंकि अनेकान्तात्मक वस्तु में जो परस्पर विरोधी धर्मयुगल पाए जाते हैं, उनमें से एक धर्म निश्चय का और दूसरा धर्म व्यवहार का विषय बनता है। अतः निश्चय-व्यवहार एक-दूसरे के विरोधी से प्रतीत होते हैं, पर वस्तुतः वे हैं एक-दूसरे के पूरक। परस्परविरोधी दोनों नयों का कथन आवश्यक क्यों? दो नयों के बिना वस्तु का समग्र स्वरूप स्पष्ट नहीं हो पाएगा, क्योंकि वस्तु में दो परस्पर विरोधी धर्मयुगल पाए जाते हैं। उनमें से एक धर्म का व्यवहार और दूसरे धर्म का निश्चय कथन करता है। यदि दोनों नय एक ही पक्ष का कथन करने लगें तो दूसरा पक्ष उपेक्षित हो जावेगा। अतः वस्तु के सम्पूर्ण प्रकाशन एवं प्रतिपादन के लिए दोनों नय आवश्यक हैं। इसी दृष्टि से दोनों नय एक-दूसरे के पूरक हैं। १. समयसार, गाथा-२७ क्या परस्पर विरोधी दोनों नयों का ग्रहण एक साथ संभव है? - हाँ, परस्पर विरोधी दोनों नयों का ग्रहण एक साथ संभव है; पर इनके ग्रहण करने का तरीका जुदा है। जैसे - जहाँ जिनवाणी में निश्चय की मुख्यता से कथन हैं, वहाँ उसे 'सत्यार्थ ऐसे ही हैं' - ऐसा जानना तथा जहाँ व्यवहार की मुख्यता से कथन है, वहाँ उसे 'ऐसे है नहीं, निमित्तादि की उपेक्षा उपचार किया है' - ऐसा जानना । इसप्रकार जानने का नाम ही दोनों नयों का ग्रहण है।' दोनों नयों के कथन को समान जानकर ऐसे भी हैं, ऐसे भी हैं' - इसप्रकार दोनों नयों का एक साथ जानना, भ्रमरूप प्रवर्तन है, दोनों नयों का ग्रहण करना नहीं है। ___ क्या दोनों नय समान रूप से उपादेय हैं? - नहीं, दोनों नय समान रूप से उपादेय नहीं हैं। व्यवहार को निश्चय के समान मानना भ्रम है। व्यवहार को निश्चय के समान उपादेय न मान लिया जाए - इससे सावधान करने के लिए ही व्यवहारनय को अभूतार्थ-असत्यार्थ भी कहा गया है। व्यवहारनय अपने प्रयोजन की सिद्धि में समर्थ होने से सभी को निचली दशा में कार्यकारी है, वस्तु का निश्चय करने में उपयोगी है। अतः कथंचित् सत्यार्थ है, उपादेय है; पर प्रयोजन सिद्धि के पश्चात् उसकी उपयोगिता नहीं रहता, अतः कथंचित् असत्यार्थ है, हेय है। व्यवहारनय को असत्यार्थ कहने से कोई व्यवहार के विषय की सत्ता का भी अभाव न मान ले - इस दृष्टि से व्यवहार को भी कथंचित् सत्यार्थ कहा गया है। निश्चयनय उपादेय है, क्योंकि अनुभूति की प्रक्रिया में निश्चयनय प्रधान होता है। उसके विषयभूत आत्मा के आश्रय से मुक्ति की प्राप्ति होती है, इसलिए इसे भूतार्थ, सत्यार्थ कहा है। संक्षेप में कहें तो जिसके आश्रय से मुक्ति हो, वह भूतार्थ और जिसके आश्रय से मुक्ति न हो वह अभूतार्थ है। १. मोक्षमार्गप्रकाशक, पृ. २५१
SR No.009461
Book TitleNaychakra Guide
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShuddhatmaprabha Tadaiya
PublisherTodarmal Granthamala Jaipur
Publication Year
Total Pages33
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size1 MB
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