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________________ 81 आत्मा ही परमात्मा है ___ अत्यन्त गद्गद् होते हुए वे कहने लगे - "भाई तुम्हें पैसे जमा कराने की क्या आवश्यकता थी ? तुम्हारे पिताजी स्वयं बीस वर्ष पहिले तुम्हारे नाम एक करोड़ रुपये बैंक में जमा करा गये हैं, जो अब ब्याज सहित दश करोड़ से भी अधिक हो गये होंगे । मरते समय यह बात वे मुझे बता गये थे ।" ___ यह बात सुनकर वह एकदम उत्तेजित हो गया । थोड़ा-सा विश्वास उत्पन्न होते ही उसमें करोड़पतियों के लक्षण उभरने लगे । वह एकदम गर्म होते हुए बोला - "यदि यह वात सत्य है तो आपने अभी तक हमें क्यों नहीं बताया ?" ___ वे समझाते हुए कहने लगे - "उत्तेजित क्यों होते हो ? अब तो बता दिया । पीछे की जाने दो, अब आगे की सोचो ।" ___ "पीछे की क्यों जाने दो ? हमारे करोड़ों रुपये बैंक में पड़े रहे और हम दो रोटियों के लिये मुँहताज हो गये । हम रिक्शा चलाते रहे और आप देखते रहे । यह कोई साधारण वात नहीं है, जो ऐसे ही छोड़ दी जावे; आपको इसका जवाब देना ही होगा ।" "तुम्हारे पिताजी मना कर गये थे ।" "आखिर क्यों ?" "इसलिए कि बीस वर्ष पहले तुम्हें रुपये तो मिल नहीं सकते थे । पता चलने पर तुम रिक्शा भी न चला पाते और भूखों मर जाते ।" "पर उन्होंने ऐसा किया ही क्यों ?" "इसलिए कि नावालिगी की अवस्था में कहीं तुम यह सम्पत्ति बर्बाद न कर दो और फिर जीवनभर के लिए कंगाल हो जावो । समझदार हो जाने पर तुम्हें ब्याज सहित आठ-दश करोड़ रुपये मिल जावें और तुम आराम
SR No.009440
Book TitleAatma hi hai Sharan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHukamchand Bharilla
PublisherTodarmal Granthamala Jaipur
Publication Year1998
Total Pages239
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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