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________________ वाले लोगों के लिए ही उपयुक्त हो सकते हैं, परन्तु जिनकी नाड़िये कड़ी एवं कठोर '• होती है, उनके लिए दूसरे आसन ज्यादा हितकर होते हैं। कौन सा आसन हमारी शरीर संरचना और आवश्यकता के अनुकूल होता है, उसका अनुभव व्यक्ति की स्वयं की सजगता पर निर्भर करता है। आसन का प्रयोग करते समय हमें इस बात का सूक्ष्मता से ध्यान रखना चाहिये कि उस आसन का दबाव शरीर के किन-किन अंगों पर कितना-कितना पड़ता हैं। दो तीन दिन के प्रयोग के पश्चात् हानि लाभ का अनुभव होने लगता है। उसी के अनुरूप स्वयं के लिए कुछ उपयोगी आसनों का चयन करना चाहिए। अपने बारे में जितनी जानकारी स्वयं को होती हैं उतनी किसी अन्य को हो नहीं सकती। आसन को प्रभावी बनाने वाले तथ्य कोई भी आसन झटके से नहीं करना चाहिए। किसी भी आसन को करने के पश्चात् उसके विपरीत दिशा में शरीर पर तनाव देने वाले आसन को भी अवश्य करना चाहिए। प्रत्येक आसन के पश्चात् यथा संभव शवासन अवश्य करना चाहिए। आसनों के लिए प्रातःकाल का समय ही सर्वश्रेष्ठ होता है। आसन करते समय शरीर पर तंग कपड़े नहीं होने चाहिये, जिससे आसन करते समय शरीर से निकलने वाली गन्दी वायु के बाहर जाने में और उसके स्थान पर नवीन स्वच्छ वायु के स्पर्श में बाधा उपस्थित होती है। आसन ऐसे स्थान पर करना चाहिये जहां वातावरण में आक्सीजन की मात्रा अधिक हो। आसन अनेक होते है और सबकी आवश्यकता अलग-अलग होती है। अतः आसन सम्बन्धी सत्साहित्य का आलम्बन लेकर, अपने अनुकूल चंद नियमित आसनों का चयन कर लेना चाहिये। विशेष परिस्थितियों में अनुभवी योगाचार्य के निर्देशन में कठिन आसन भी सीख कर किये जा सकते हैं। - अंग व्यायाम जिस प्रकार यदि किसी गतिशील मशीन, वाहन अथवा स्प्रिंग को काम में न लिया जाए तो उसमें जंग लगने. से. भविष्य में उसका हलन–चलन प्रभावित हो सकता है। ठीक उसी प्रकार हमारे शरीर में भी ऐसी अनेक मांसपेशियाँ होती हैं जिसका हलन चलन न होने से उस पर विकार जमा होने की संभावना रहती हैं। अतः यदि उन मांसपेशियों का नियमित रूप से हलन चलन किया जाए तो उनमें विकृति आने की कम संभावना रहती है। अंग व्यायाम शरीर के प्रत्येक अंग उपांग की मांसपेशियों को जितना संभव हो आगे-पीछे, दायें-बायें, ऊपर-नीचे घुमाने, खींचने, दबाने, सिकोड़ने और फैलाने से सम्बन्धित अंग की मांसपेशियाँ सजग और सक्रिय हो जाने से, उस भाग में रक्त परिभ्रमण नियमित होने लगता है। आँख, कान, नाक, मुँह, गला और शरीर के मुख्य जोड़ों के अंग व्यायाम से वहां प्राण ऊर्जा का 74
SR No.009380
Book TitleSwadeshi Chikitsa Swavlambi aur Ahimsak Upchar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorChanchalmal Choradiya
PublisherSwaraj Prakashan Samuh
Publication Year2004
Total Pages96
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size4 MB
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