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________________ प्रियदर्शिनी टीका अ० १ गा ३ जविनीतलक्षणम् आणांऽणिदेसकरे, गुरूणमणुवायकारए। पडिणीए असर्बुद्धे, अविणीएं-त्ति वुर्चइ ॥३॥ छायाआताऽनिर्देशकरो गुरुणामनुपपातकारकः । प्रत्यनीकोऽसयुद्ध. अविनीत इत्युच्यते ॥ ३॥ टीका'आणाऽणिद्देसकरे' इत्यादि । आनाऽनिर्देशकरः आज्ञाया गुरुवचनस्यानिर्देशकर.-अनादरकारकः, तथा गुरूणाम् आचार्यादीनाम् , अनुपपातकारका समीपान पस्थायी, गुस्णा सनियों तिष्ठामि चेद् गुरवो मा स्वकार्यार्थमाज्ञापयिष्यन्तीति विज्ञाय दूरे तिप्ठतीत्यर्थः । तथा-प्रत्यनीका प्रतिकूल', गुरुदोपान्वेषणपर इत्यर्थः । तथा-असम्बुद्ध, जीवानीवादितत्त्वानभिज्ञः, एक्भूतो यः शिष्यः स खल्वविनीत इत्युच्यते। शिष्य में विनीतता, अविनीतता के परित्याग से ही आती है इसलिये विनीत से विपरीत अविनीत का स्वरूप सूत्रकार कहते हैं'आगाऽणिद्देसकरे०' इत्यादि । ___ अन्वयार्थ-(गुरूण आणाऽणिद्देसकरे-गुरूणा आज्ञाऽनिर्देशकर.) गुरु की आज्ञा का अनादर करने वाला, (अणुववायकारण) उनके समीप नहीं बैठने वाला (पडिणी) उनसे सदा प्रतिकूल बर्ताव करनेवाला (असवुद्धे) जीव एव अजीव आदि के स्वरूप को नहीं जाननेवाला ऐसा शिष्य (अविणी बुच्चड-अविनीत'-उच्यते) अविनीत कहा जाता है। भावार्थ-इस गाथा द्वारा सूत्रकार ने विनीत से विपरीत अविनीत का स्वरूप प्रदर्शित किया है । यद्यपि यह वात अर्यापत्ति से स्वय सिद्ध શિષ્યા વિનીતતા અવિનીતતાના પત્યિાગથી જ આવે છે. આ માટે विनीतबी विपरीत विनीतनु १३५मूत्रमार - 3-'आणाऽणिदेसकरे' त्यहि ___अन्वयार्थ:--(गुरूण आणाऽणिदेसकरे गुरूणा आज्ञाऽनिर्दशकर)शुरुनी माज्ञान! मनाह२ ३२वावास (अणुववायफारए) मेमनी भाभ नामसवापामा (पडिणीए) समनायी सहा प्रतिळूण तापवावाणा (असबुद्ध) ७१ मने म94 महिना स्१३पने नही वाणा मेवा शिष्य (अविणीए-वुच्चइ-अविनीत उच्यते) અવિનીત કહેવાય છે ભાવાર્થઆ ગાથાદ્વારા સૂવારે વિનીતથી વિપરીત અવિનીતનું સ્વરૂપ પ્રદર્શિત કરેલ છે જેકે આ વાત અર્થોપત્તિથી સ્વયસિદ્ધ થઈ જતી હતી
SR No.009352
Book TitleUttaradhyayan Sutram Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1959
Total Pages961
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_uttaradhyayan
File Size28 MB
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