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________________ क्षमावणीपर्व जल-फल आदि मिलायके, अरघ करो हरषाय | दु:ख-जलांजलि दीजिए, श्रीजिन होय सहाय || क्षमा गहो उरजी वड़ा, जिनवर-वचन गहाय | ओं ह्रीं श्री अष्टांगसम्यग्दर्शन-अष्टांगसम्यग्ज्ञान-त्रायोदशविध्-सम्यक्चारित्रोभ्यो अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ॥ समुच्चय चौबीसी जिनपूजन जल फल आठों शुचिसार, ताको अर्घ करों । तुमको अरपों भवतार, भवतरि मोक्षवरों ॥ चौबीसों श्री जिनचन्द, आनन्द कन्द सही । पद जजत हरत भवफन्द, पावत मोक्ष - मही ॥ ॐ ह्रीं श्रीवृषभादिमहावीरान्तेभ्यो अनर्घपदप्राप्तये अर्घं निर्वपामीति स्वाहा । - देव शास्त्र गुरु समुच्चय पूजन ( रचयिता - वृन्दावनदास ) अष्टम वसुधा पाने को, कर में ये आठों द्रव्य लिये । सहज शुद्धस्वाभाविकता से, निज में निज गुण प्रकट किये ॥ ये अर्घ्य समर्पण करके मैं, श्री देव शास्त्र गुरु को ध्याऊँ । विद्यमान श्री बीस तीर्थंकर, सिद्ध प्रभु के गुण गाऊँ।। ॐ ह्रीं श्रीदेवशास्त्रगुरुभ्यः श्रीविद्यमानविंशतितीर्थंकरेभ्य: श्री अनन्तानन्त सिद्धपरमेष्ठिभ्यो अनर्घपदप्राप्तये अर्घं निर्वपामीति स्वाहा । 105
SR No.009251
Book TitleJin Samasta Ardhyavali Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorZZZ Unknown
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages116
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
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