SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 157
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ श्री सुदर्शन मेरू की आरती (1) ॐ जय श्री मेरू जिनं, स्वामी जय श्री मेरू जिनं। सोलह चैत्यालय से, शोभित गिरि अनुपम।।ॐ जय.।।टेक.।। भद्रशाल वन भू पर, वन उपवन सोहे।स्वामी..... चउ दिशि चार जिनालय, जिन प्रतिमा शोभे।।ॐ जय.॥१॥ पांच शतक योजन पर, नंदनवन आता।।स्वामी....... साढ़े बासठ सहस सुयोजन, सुमनस मन भाता।।ॐ जय.॥२॥ चंपक तरू आदिक से, मंडित चैत्यालयास्वामी...... कांचन मणिमय शुभ रत्नों से, सुंदर जिन आलय।।ॐ जय.॥३।। सहस छत्तीस सुयोजन, पांडुक सौख्य भरे।स्वामी...... तीर्थंकर अभिषेक जहां पर, सुर नर द्वन्द करें।।ॐ जय.॥४॥ बिम्ब अचेतन होकर, चेतन फल देवें।स्वामी...... भाव “चंदना' जग में, खुशियां भर देवें।।ॐ जय.॥५॥ 157
SR No.009245
Book TitleJain Arti Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorZZZ Unknown
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages165
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy