SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 106
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir ६७. भावना भावना भवतारिणी है । जहाँ भावना है वहाँ भव्यता और दिव्यता है ।। शालिभद्र ने पूर्वजन्म में असीम भावपूर्वक साधु को खीर वहोराई थी, इसलिए दूसरे भव में उसे असीम ऋद्धि-सिद्धि प्राप्त कुमारपाल ने हृदय की निर्मल भावना से अपने पांच कौड़ी के फूल प्रभु के चरणों में चढ़ाये परिणाम- स्वरूप अठ्ठारह देशों के राजा बने । अंतर के उल्लास सहित करने से कोई भी काम हलका हो जाता है । कार्य अपनी भावना पूरी करने के लिए करना है, बदले के लिए नहीं । कार्य के पीछे संगीत चाहिए । माता अपने पुत्र से कभी प्रमाणपत्र नहीं माँगती । तुम्हारा अपना कोई न हो फिर भी अगर जीवन में भावना होगी, तो जगत तुम्हारा बन जायेगा। दान, शील, तप, भाव -- इन चार प्रकार के धर्मों से आत्मा का ज्ञान होगा । भगवान् महावीर के जीव को नयसार के भव में प्रथम भाव दान का हुआ था कि-'किसी को भोजन कराकर मैं भोजन करूँ । इस प्रकार अतिथि सत्कार की भावना उनके मन में जागृत हुई । For Private And Personal Use Only
SR No.008736
Book TitleSamvada Ki Khoj
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPadmasagarsuri
PublisherArunoday Foundation
Publication Year1990
Total Pages139
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Spiritual
File Size6 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy