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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir ध्यान और साधना __ मैनेजर ने कह दिया कि - कोई रूम खाली नहीं है; परन्तु आगन्तुक बहुत चतुर था. उसने की-बोर्ड पर नजर डाली, वहाँ एक चाबी लटक रही थी. उसे देखकर मैनेजर से कहा - “यह चावी बता रही है कि इस लॉज में एक रूम खाली है, फिर आप क्यों इन्कार कर रहें हैं?" मैनेजर ने सेठ मफतलाल के झगडालू स्वभाव की बात कही और यह भी बता दिया कि जरा भी डिस्टर्बेस उन्हें पसन्द नहीं आता. आगन्तुक ने मैनेजर को विश्वास दिलाया कि मैं जरा भी डिस्टर्व नहीं करूँगा, कदम भी धीरे-धीरे रखूगा. किसी को मालूम तक नहीं होने दूंगा कि यहाँ कोई आकर ठहरा भी है. आप मुझे रूम दे दीजिये. मैनेजर ने उसे चावी सौंप दी. आगन्तुक बहुत थका हुआ था. ताला खोल कर उसने ऊपर वाले रूम में प्रवेश किया. फाटक के पास ही दीवार पर स्विच बोर्ड लगा था. उसने स्विच ऑन किया. फाटक वन्द करके सीधे पलंग पर वैठते ही एक पाँव से जूता निकाल कर फाटक के पास धचाक् से फंक दिया. उसी समय मैनेजर को दिया हुआ अपना, ध्वनि न करने का आश्वासन याद आया. वह सम्भल गया. दूसरा जूता उसने धीरे-से निकाला और दबे पाँवों से जाकर पहले जूते के पास रख दिया और फिर अपने पलंग पर आकर लेट गया. उधर थोड़े समय बाद सेठ मफतलाल सीढ़ी चढ़कर ऊपर आये. उस रूम का दरवाजा खटखटाया आगन्तुक व्यक्ति ने उठकर द्वार खोला. सामने सेठ खड़े थे. बोले - “आपको मैंने डिस्टर्ब किया, इसके लिए क्षमा करें. पिछला एक घण्टा मेरा बहुत बेचैनीसे गुजरा. आप आये, मैनेजर से चावी ली, रूम खोला, पलंग पर बैठकर एक जूता खोला-यह सब मुझे मालूम है. मैं इस रूम के नीचे वाले रूम में लेटा हुआ था. मैं भी आज ही आया हूँ. आपने एक जूता फेंका. उसकी आवाज मुझे आई; परन्तु दूसरे जूते का क्या हुआ-यह मुझे समझ में नहीं आया. आप लँगड़े हैं या एक पाँव में लकवा है अथवा एक जूता आपका कहीं खो गया है-क्या वात है? खूब विचार करने पर भी यह रहस्य सुलझ नहीं पाया. उससे इतनी बैचेनी हो गई कि अपनी शंका का समाधान करने के लिए मुझे आपके पास आना पड़ा है. मेरे दिमाग में घुसे हुए जूते को यदि आप निकाल देगें तो मुझे आसानी से नींद आ जायेगी. आगन्तुक ने हँस कर कहा – “सेठजी! पहला जूता निकाल फेंकने के बाद मुझे ध्वनि न करने को अपना (मैनेजर को दिया) आश्वासन याद आ गया था; इसलिए दूसरे पांव के जूते को निकाल कर धीरे से मैंने पहले जूते की बगल में रख दिया था; इसलिए उसकी आवाज आपको सुनाई नहीं दी." सेठ मफतलाल दूसरा जूता दिमाग से निकालने के लिए आगन्तुक को धन्यवाद देकर अपने रूम को लौट गये. हमारे दिमाग में भी संसार का जूता ऐसा घुसा हुआ है कि अपने आपको जानने का हम प्रयास ही नहीं करते. दूसरों को ही देखते हैं, अपने को नहीं. साधना के लिए यह जरूरी है For Private And Personal Use Only
SR No.008716
Book TitleJivan Drushti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPadmasagarsuri
PublisherArunoday Foundation
Publication Year1995
Total Pages134
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Education
File Size7 MB
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